!! ॐ !!


Sunday, August 22, 2010

!! मेरे अवगुण मिटा दो सब आज... !!




हे! मेरे प्रिय श्यामसुन्दर...

मेरी तुमसे केवल एक ही अरजी है... कृपा कर मेरे सारे अवगुणों को मेरे चित से बाहर निकाल फेंको और आन विराजो मेरे इस हृदय रूपी सिंहासन पर... इस दास को अपनी कृपा का पात्र बनाओ श्यामसुन्दर...






मेरे अवगुण मिटा दो सब आज...
ओ श्यामसुन्दर मेरी अरज सुनो...
ओ साँवरिये मेरी अरज सुनो...


मैं मुरख हूँ नाहि जानू, पूजा पाठ हो कैसे...
नाम जपु बस हरपल तेरा, नाम जपु बस हरपल तेरा...


रखना शरण में पालनहार...
ओ श्यामसुन्दर मेरी अरज सुनो...
ओ साँवरिये मेरी अरज सुनो...


पापी हूँ तो भी तेरा, तू ही तारनेवाला..
तुम न मुझको तारोगे तो, तुम न मुझको तारोगे तो...


कौन तारेगा तारणहार...
ओ श्यामसुन्दर मेरी अरज सुनो...
ओ साँवरिये मेरी अरज सुनो...


जैसी मरजी रखना श्यामसुन्दर, बस इतनी है अरजी...
निकले अंत में मेरे मुख से, निकले अंत में मेरे मुख से....


नाम ही तेरा बारम्बार...
ओ श्यामसुन्दर मेरी अरज सुनो...
ओ साँवरिये मेरी अरज सुनो...


मेरे अवगुण मिटा दो सब आज...
ओ श्यामसुन्दर मेरी अरज सुनो...
ओ साँवरिये मेरी अरज सुनो...



!! जय जय श्री श्यामसुन्दर जी !!

Saturday, August 21, 2010

!! अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ... !!





अनुपम मूरत थारी, ओ मेरे श्यामसुंदर !!  थारे  इस मनमोहक रूप को निरख-निरख, मेरे दिल में यही ख्याल आता हैं, की अगर मेरा जोर चले तो थारी इस मोहिनी मूरत की नज़र हीरे मोतियों से उतार दूँ...और थारे  इस अनुपम श्रृंगार को और भी अनुपम सजा दूँ... और अगर मेरा जोर चले तो थारे इन प्यारे प्यारे गालो पे काली टिकी लगाने के लिए सूरज को भी इस ज़मीं पे उतार दूँ...








हे! मेरे श्यामसुन्दर

अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...
जैसे उंवारे नून-राई श्यामसुंदर, सोना चांदी उंवार दूँ...



प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का, खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
काली टिकी लगावन  ताइं, सूरज नीचे उतार दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...








प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
आसमान का तारा तोड़ू,  थारे मुकुट में टाक  दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...























प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का, खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
चाँद और सूरज की लाली ले, थारे होठा-लाली लगाये दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...




प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का, खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
इन अंखियन का घुंघरू बना कर, थारे चरणा माहि बांध दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...




प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का, खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
कालजड़ा को बना के काजल, थारी अंखिया माहि घाल दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...























प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का, खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
इन पलकों की कंघी बना, थारा घुंघराला बाल सवार दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...




प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का, खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
रोम रोम की झाड़ू बना मैं, चौखट थारी बुहार दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...




प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का, खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
असुवन की गंगा से थारा, पावन चरण पखार दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...






















प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का, खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
सारी दुनिया की रेशम से, थारो पेंचो बांध दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...



प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का, खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
सारा रंग ले इंद्रधनुष से, थारो बागो रंगाये दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...






















प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का, खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
ई धरती की बना के टिकी, थारे माथे लगाये दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...



प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का, खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
नीलगगन की बना के मखमल, थारो परदों बनाये दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...;
























प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का, खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
सारे बदन की चमड़ी उतारूँ, चरणा की जुती बनाये दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...




प्यारा प्यारा श्यामसुन्दर का, खूब सजा श्रृंगार...
सोहना सोहना चाँद-सा बनरा, बन बैठ्या सरकार...
श्यामसुन्दर तुझे निरख-निरख कर, सौ सौ जनम गुजार दूँ...
अगर जोर मेरो चाले, हीरे मोती से नज़र उतार दूँ...



!! जय जय श्री श्यामसुन्दर जी !!




छवियाँ सौजन्य से :  "श्री रोहन शांति शुक्ला जी"
                                      भाव :  "श्री जयशंकर चौधरी जी"

                                                    

Thursday, August 19, 2010

!! जब जब सावन आये... !!


!! हिंडोरे में विराजित श्री श्री राधारमण लाल जी !!


सावन के महीने की रिमझिम बारिश और प्राकृतिक वातावरण बरबस ही मन को उल्लास व उमंग से भर देती है, और साथ ही साथ याद दिलाती है, श्रीधाम वृंदावन के हिंडोरा महोत्सव की...और जब जब ये सावन का महिना आता है, तब तब मेरा यह ह्रदय और मेरे नयन श्री धाम वृंदावन के श्री राधारमण जी के द्वार उन्हें हिंडोरो पर विराजित देखने को लालायित हो जाते हैं...




जब जब सावन आये...
नित मेघन घटा छाये...
कि मन में उमंग जगाये...
जाऊँगा मैं श्री राधारमण के द्वार...
सोहना सोहना मेरे लाल जी का श्रृंगार...


सावन का महिना आया हैं, ये संदेशा लाया हैं...
वृंदावन जाने को, सब हो जाओ तैयार...


देखो कोई रह न जाये...
ये हवायें गुन- गुनाये...
कि मन में उमंग जगाये...
जाऊँगा मैं श्री राधारमण के द्वार...
सोहना सोहना मेरे लाल जी का श्रृंगार...



















सावन मस्त महिना हैं, श्री राधारमण जी से मिलना हैं...
अपने इस दिल का, सुनाऊंगा मैं हाल...


हिंडोरा में लाल को बिठाये...
नित मेघन घटा छाए...
कि मन में उमंग जगाये...
जाऊँगा मैं श्री राधारमण के द्वार...
सोहना सोहना मेरे लाल जी का श्रृंगार...


हिंडोरा में लाल को झुलाऊंगा, प्रेम सुधारस बरसाऊंगा...
उनके श्री मंदिर में, लग जाएगी कतार..


हिल मिल रंग जमाये...
ये हवायें गुन- गुनाये...
कि मन में उमंग जगाये...
जाऊँगा मैं श्री राधारमण के द्वार...
सोहना सोहना मेरे लाल जी का श्रृंगार...




जब जब सावन आये...
नित मेघन घटा छाये...
कि मन में उमंग जगाये...
जाऊँगा मैं श्री राधारमण के द्वार...
सोहना सोहना मेरे लाल जी का श्रृंगार...



!! जय जय श्री राधा रमण लाल जी !!

          
              छवियाँ  सौजन्य से :  "श्री वैष्णवाचार्य पुष्पांग गोस्वामी जी"
                                 भाव :  "स्वरचित"


!! तेरे साथ से गुलाम अब, गुलफाम हो रहा है... !!





हे! मेरे श्यामसुन्दर...

जितना दिया तुने इस दास को, उतनी तो मेरी औकात नहीं..
यह तो करम है सिर्फ तेरा, वरना मुझेमें तो ऐसी कोई बात नहीं...
ये तो करम है मेरे स्वामी का, यह तो करम है मेरे श्यामसुन्दर का..
वरना मुझेमें तो ऐसी कोई बात नहीं...

हे! मेरे श्यामसुन्दर...


 




हे! मेरे श्यामसुन्दर...


मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...
मेरा आपकी दया से, सब काम हो रहा हैं...
करते हो तुम श्यामसुन्दर, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...
मेरा आपकी दया से, सब काम हो रहा हैं...


पतवार के बिना ही, मेरी नाव चल रही हैं...
हैरान है ज़माना, मंजिल भी मिल गयी हैं...
करता नहीं मैं कुछ भी, सब काम हो रहा है...
करते हो तुम श्यामसुन्दर, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...


तुम साथ हो जो मेरे, किस चीज़ की कमी है...
किसी और चीज़ की अब, दरकार भी नहीं हैं...
तेरे साथ से गुलाम अब, गुलफाम हो रहा है...
करते हो तुम श्यामसुन्दर, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...


मैं तो नहीं हूँ काबिल, तेरा पार कैसे पाऊं...
इस टूटी हुए वाणी से, गुणगान कैसे गाऊं...
तेरी प्रेरणा से ही सब, यह कमाल हो रहा हैं...
करते हो तुम श्यामसुन्दर, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...


करता नहीं मैं फिर भी, हर काम हो रहा हैं...
श्यामसुन्दर तेरी बदौलत, आराम हो रहा हैं...
बस होता रहे हमेशा, जो कुछ भी हो रहा हैं...
करते हो तुम श्यामसुन्दर, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...


मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...
मेरा आपकी दया से, सब काम हो रहा हैं...
करते हो तुम श्यामसुन्दर, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...
मेरा आपकी दया से, सब काम हो रहा हैं...
























ओ मेरे श्यामसुन्दर, जब आपकी कृपा इस दास पर हो ही रही है तो, मैं क्यों किसी और के पास जाऊं ??? क्यों मैं किसी और का अहसान लूँ, मुझे तो बस अब तेरे नाम का ही सहारा काफी हैं...


अहसान लूँ किसी का, ये मुझको नहीं गंवारा...
जीने को जब काफी हैं, तेरे नाम का सहारा...


माना की धीरे धीरे, मेरी नाव चल रही है...
लेकिन सही दिशा में, मंजिल पे बढ़ रही हैं...
भले देर से मिले पर, मिल जायेगा किनारा...
जीने को जब काफी हैं, तेरे नाम का सहारा...


काबिल नहीं हूँ जिसका, वो इनाम ले लिया हूँ...
पूछे बिना ही तुमसे, तेरा नाम ले लिया हूँ...

इसके सिवा लिया न, कुछ और तो तुम्हारा...
जीने को जब काफी हैं, तेरे नाम का सहारा...


तेरा नाम लेके जागुं, तेरा नाम लेके सोऊं ,
तेरे नाम के सहारे, जीवन अपना बिताऊं,
अपना तो चल रहा है, आराम से गुजारा...
जीने को जब काफी हैं, तेरे नाम का सहारा...


तेरे नाम का करिश्मा, मैंने तो जब से जाना...
सब छोड़ कर हुआ मैं, तेरे नाम का दीवाना...
मुझको तो सारे जहां से, तेरा नाम लगता प्यारा...
जीने को जब काफी हैं, तेरे नाम का सहारा...


अहसान लूँ किसी का, ये मुझको नहीं गंवारा...
जीने को जब काफी हैं, तेरे नाम का सहारा...


मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...
मेरा आपकी दया से, सब काम हो रहा हैं...
करते हो तुम श्यामसुन्दर, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...
मेरा आपकी दया से, सब काम हो रहा हैं...



!! जय जय श्री श्यामसुन्दर जी !!
 

!! मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी... !!





!! जय जय नीलमणि नन्दलाल की !!
!! जय जय गौरवर्ण बलराम जी की !!


इस अनुपम एवं मनोहारी और चित्त को शांतचित्त कर देने वाली छवि को देख, मुझे सूरदास जी द्वारा रचित एक बहुत ही सुन्दर पद का वर्णन करने का मन कर रहा है, आइये चले सूरदास जी द्वारा रचित इस पद के भावो का रसास्वादन करे..


इस अनुपम छवि मे हमारे नीलमणि नन्दलाल, छोटे से गोपाल को यशोदा मैया और दाऊ भैया मिलकर श्रृंगार कर रहे है...दाऊ भैया उनके पैरों में पायल पहना रहे हैं...मैया ने उनके केशों को संवारा हैं और उन्हें तरह तरह के आभूषण पहना रही हैं...तभी आकस्मात ही नन्दलाल कन्हैया की नज़र दाऊ भैया की सिर की चोटी पर पड़ती है, जिससे उनको कुछ याद आता है....और वे मैया को उलाहना देने लगते हैं...


जैसा की हम सभी जानते है, कि प्राय: छोटे बालक दूध पीने के लिए आनाकानी किया करते है....वैसे ही हमारे नटखट नीलमणि नन्दलाल भी अपने बाल स्वभाव के वशीभूत हो प्राय: दूध पीने में आनाकानी किया करते थे....तत्पश्चात एक दिन मैया यशोदा ने अपने प्रिय कनुआ को प्रलोभन दिया कि : “अरे कनुआ! तू नित्य प्रतिदिन कच्चा दूध पिया कर....इससे तेरी सिर की चोटी तेरे दाऊ भैया जैसी मोटी और लंबी हो जाएगी....“


मैया कि यह बात सुन कन्हैया नित्य प्रतिदिन बिना आनाकानी के दूध पी लिया करते थे... लेकिन बहुत दिन बीत जाने के बाद एक दिन कन्हैया ने देखा कि उनकी चोटी तो अभी भी दाऊ भैया की चोटी से छोटी है, तो (निश्चल बालहृदय को क्या पता की उसकी स्वयं चोटी तो बढ़ ही रही थी, लेकिन साथ ही साथ उसके भैया की चोटी बढ़ रही थी, इसलिए उनको अपनी चोटी छोटी लगती थी..) फिर वे अपनी मैया यशोदा से उलाहना देते हुए कहते है :


मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी...
किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी..
तू जो कहति बल की बेनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी...
काढ़त गुहत न्हवावत जै है नागिन-सी भुई लोटी...
काचो दूध पियावति पचि पचि देति न माखन रोटी...
सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी...


“अरी मोरी प्यारी मैया! अब तू ही बता न, कि मेरी यह चोटी कब बढ़ेगी...? तेरे कथन के अनुसार मुझे दूध पीते हुए कितना समय हो गया.....लेकिन ये चोटी तो अब तक भी वैसी ही छोटी है......अरी मैया! तू तो कहती थी कि दूध पीने से मेरी यह चोटी दाऊ भैया की चोटी जैसी लंबी व मोटी हो जाएगी...लेकिन यह तो अभी अभी दाऊ भैया कि चोटी से छोटी है.... संभवत: इसीलिए तू मुझे नित्य नहलाकर मेरे केशो को कंघी से संवारती है, मेरी चोटी गूंथती है... जिससे चोटी बढ़कर नागिन जैसी लंबी हो जाए....और मुझे कच्चा दूध भी इसीलिए पिलाती है... अरी मैया ! इस चोटी के ही कारण तू मुझे माखन व रोटी भी नहीं देती....”


इतना कहकर हमारे प्रिय नीलमणि नंदलाला अपनी मैया से रूठ जाते हैं....और श्री सूरदास जी कहते हैं कि तीनों लोकों में श्री श्यामसुन्दर और श्री बलभद्र जी की अनुपम जोड़ी मन को सुख पहुंचाने वाली है...


!! जय जय नीलमणि नन्दलाल की !!
!! जय जय गौरवर्ण बलराम जी की !!

Mukesh K. Agrawal

नोट : “सूरदास जी द्वारा रचित इस इस अनुपम सुन्दर पद  “मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी” के भावार्थ के शाब्दिक लेखन में कुछ त्रुटि हो तो क्षमा कीजियेगा..”


!! जय जय नीलमणि नन्दलाल की !!
!! जय जय गौरवर्ण बलराम जी की !!

Tuesday, August 17, 2010

!! आओ, आओ, सांवरिया बेगा आओ, थे मत न देर लगाओ !!





ओ मीठो है, नमकीन है श्यामसुन्दर, और चडपड़ो थोरो खाटो..
सोने की थाली में परोस्यों, घाल चाँदी को बाटो...
थारा टाबरिया मनुहार करे श्यामसुन्दर, देखू थे कईया नाटो...
ओ भोग लगाओ श्यामसुन्दर म्हारा, बाकी भगतां न बाँटो...







आओ आओ सांवरिया बेगा आओ, थे मत न देर लगाओ....
जीमो जी भोग लगाओ, है छप्पन भोग तैयार जी...
थारा टाबरिया करे है मनुहार जी...


केशरिया बर्फी, कलाकंद, रबड़ी, पेड़ा, इमरती, बालूशाही,
लाडु, बुन्दिया, जलेबी, रसगुल्ला, गाजरपाक, रसमलाई,
गुलाबजामुन, शक्करपाड़ा, घेवर न्यारा न्यारा...
जी में आवे, जीको थे और घलाओ, जीमो जी भोग लगाओ...
है छप्पन भोग तैयार जी...
थारा टाबरिया करे है मनुहार जी...




दालमोठ, पकोड़ी, कचोड़ी, भुजिया, पापड़, चिवड़ो,
कढ़ी, रबड़ी, साग सांगरी को, बाजरे को खीचड़ो,
रायता में जीरा को तड़को, पियो मार सबड़को...
संग काचरी की चटनी थे खाओ, जीमो जी भोग लगाओ...
है छप्पन भोग तैयार जी...
थारा टाबरिया करे है मनुहार जी...


आम, अमरुद, अंगूर, अनानास, आलूबुखारा, अनार धरा,
केला, सेब, पपीता और चीकू, संतरा, मौसंबी, रसधार भरा,
काकड़िया रा, लाल मतिरा और टमाटर खीरा...
नींबू खाठो थे थोड़ो छिड़कावो, जीमो जी भोग लगाओ...
है छप्पन भोग तैयार जी...
थारा टाबरिया करे है मनुहार जी...




आओ आओ सांवरिया बेगा आओ, थे मत न देर लगाओ....
जीमो जी भोग लगाओ, है छप्पन भोग तैयार जी...
थारा टाबरिया करे है मनुहार जी...


काजू, किसमिस, नोजा, खुरमानी, खोपरा, छुहारा, बादाम ल्यो,
जीम जूठ और आचमन करके, फिर थोड़ो आराम ल्यो,
सौफ, इलायची हाज़िर कर दी, और संग में मिश्री धर दी...
एक नागरियो पान भी चबाओ, जीमो जी भोग लगाओ...
है छप्पन भोग तैयार जी...
थारा टाबरिया करे है मनुहार जी...




छप्पन भोग परोस्याँ थारा भगतां, श्यामसुन्दर स्वीकार करो,
यो भक्त बावड़ो थारी महिमा गावे, श्यामसुन्दर अंगीकार करो,
लीला थारी, सब जग जाने, थे हो प्रेम दीवाने...
ह्रदय स म्हान तो थे ही तो लगाओ, जीमो जी भोग लगाओ...
है छप्पन भोग तैयार जी...
थारा टाबरिया करे है मनुहार जी...


आओ आओ सांवरिया बेगा आओ, थे मत न देर लगाओ....
जीमो जी भोग लगाओ, है छप्पन भोग तैयार जी...
थारा टाबरिया करे है मनुहार जी...



!! जय जय श्री श्यामसुन्दर जी !!

Sunday, August 15, 2010

!! ओ देखो, वृंदावन को सरदार, लागे बड़ो प्यारो !!



!! श्री श्री राधारमण सरकार !! 


ओ देखो वृंदावन को सरदार, लागे बड़ो प्यारो...
श्री राधारमण सरकार, लागे बड़ो प्यारो...
प्यारो-प्यारो लागे लालो, सोहनो-सोहनो लागे...
वृंदावन को सरदार, लागे बड़ो प्यारो...


किसने ओ लाला तेरा गजरा बनाया....
किसने ओ लाला तेरा गजरा बनाया....
गजरे में फूल हज़ार, लागे बड़ो प्यारो...
श्री राधारमण सरकार, लागे बड़ो प्यारो...


मैं तो कहू, तोहे नज़रे ना लागे...
देऊ मैं नून-राइ वार, लागे बड़ो प्यारो...
प्यारो-प्यारो लागे लालो, सोहनो-सोहनो लागे...
वृंदावन को सरदार, लागे बड़ो प्यारो...


कोई कहे गोविंदा, कोई कहे गोपाला...
कोई कहे गोविंदा, कोई कहे गोपाला...

तेरे है नाम हज़ार, लागे बड़ो प्यारो...
श्री राधारमण सरकार, लागे बड़ो प्यारो...


ओ देखो वृंदावन को सरदार, लागे बड़ो प्यारो...
श्री राधारमण सरकार, लागे बड़ो प्यारो...
प्यारो प्यारो लागे लालो, सोहनो सोहनो लागे...
वृंदावन को सरदार, लागे बड़ो प्यारो...


!! जय जय श्री राधारमण लाल जी !!

Friday, August 13, 2010

!! वृंदावन के मेरे, श्यामसुन्दर बिहारी !!



!! मेरे श्यामसुंदर बिहारी, तेरी महिमा है न्यारी !!



वृंदावन के मेरे, श्यामसुन्दर बिहारी...
आया हूँ प्रभु, शरण तिहारी...
हारे हुए का, तुम हो सहारा...
कहलाये जग में, प्रभु कष्टहारी...


मैं भी शरण में, तुम्हारी पड़ा हूँ...
तारो न तारो, हैं मर्ज़ी तुम्हारी...
मेरे ह्रदय का, अरमान हैं ये...
निगाहों में बस जाये, सूरत तुम्हारी...


आठो प्रहर मैं, तुम्हे ही निहारूँ...
बाते करूँ तो, करूँ मैं तुम्हारी...
मुझे प्रीत तुमसे, हुई श्याम प्यारे...
तुम्हे प्रीत भाई, तो होगी हमारी...


माया में लिपटा, हुआ जीव मैं हूँ...
दया की नज़र, मुझ पे करना मुरारी...
जब भी जनम लू, बनू दास तेरा...
सेवा में अपनी, लगाना बिहारी...


मेरे ह्रदय पुंज में, गूंज गूंजे...
श्री राधे, श्री राधे, श्री राधे प्यारी...
श्यामसुन्दर बिहारी, मेरे गिरधारी...
श्री राधे, श्री राधे, श्री राधे प्यारी...


वृंदावन के मेरे, श्यामसुन्दर बिहारी...
आया हूँ प्रभु, शरण तिहारी...
हारे हुए का, तुम हो सहारा...
कहलाये जग में, प्रभु कष्टहारी...


!! जय जय श्री श्यामसुन्दर जी !!


Wednesday, August 4, 2010

!! नयनों वाला काजलिया बनाय तुझे नयनो में बसा लूँ... !!




!! जय जय श्रीधाम वृंदावन के श्री श्यामसुंदर जी !!


हे! मेरे श्यामसुंदर...आपकी यह अलौकिक छवि चित्त को हर लेने वाली है.... अरमान तो यही है, कि आपकी इस छवि को मेरे चित्त के श्रृंगार हेतु हमेशा नयन पटलो में ऐसे बसा लू, जैसे कोई स्त्री अपने मुखमंडल के श्रृंगार हेतु नित-प्रति अपने नयनो में काजल को बसा रखती है...



नयनों वाला काजलिया बनाय तुझे नयनो में बसा लू, मेरे श्यामसुंदर घनश्याम...
तुमसे तो मेरी पहले से पहचान, फिर कैसे भूले मुझे, मेरे श्यामसुंदर घनश्याम...
मोर मुकुट सिर, कुंडल सोहे कान, तेरा नयन राशीला, मेरे श्यामसुंदर घनश्याम...



रंग-बिरंगे तेरे वस्त्र घेर घुमेर, तेरी मूरत हैं प्यारी, मेरे श्यामसुंदर घनश्याम...
अब तो सुना भी दे तेरी रसीली वंशी की तान, मेरे श्यामसुंदर घनश्याम...
आके मुझे गले से लगा ले, तेरी याद सतावे, मेरे श्यामसुंदर घनश्याम...
तुमसे तो मेरी पहले से पहचान, फिर कैसे भूले मुझे, मेरे श्यामसुंदर घनश्याम...


अब तो मेरे इन नयनों में आन बसों जी, मेरे श्यामसुंदर घनश्याम...
नयनों वाला काजलिया बनाय तुझे नयनो में बसा लू, मेरे श्यामसुंदर घनश्याम...
तुमसे तो मेरी पहले से पहचान, फिर कैसे भूले श्यामसुंदर घनश्याम...



!! जय जय श्रीधाम वृंदावन के श्री श्यामसुंदर जी !!

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