!! ॐ !!


Monday, May 31, 2010

!! श्री श्री गौरा निताई !! Shri Shri Gaura Nitai

Photo Copyrighted by 'Syamarani Dasi' used with Permission

श्री चैतन्य महाप्रभु  जी और श्री नित्यानंद महाप्रभु जी, श्री हरि नाम संकीर्तन करते हुए और इस संसार में " हरे कृष्ण  हरे कृष्ण,  कृष्ण कृष्ण हरे हरे.... हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे " महामंत्र का उदघोष करते हुए.... श्रीमन चैतन्य महाप्रभु जी और नित्यानंद महाप्रभु जी, इस वसुंधरा पर अज्ञान  रूपी अंधकार को मिटा और जन जन के ह्रदय में श्री कृष्ण की भक्ति रूपी प्रकाश को प्रकाशित करने हेतु सूर्य और चन्द्र की भांति अवतरित हुए...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ...


My Heartiest Prayer unto the Lotus Feet of My Shyamsundar Ji...
 

O My Krishn... O My Shyamsundar....O My Govinda...... When will my eyes be decorated with tears of love flowing constantly when I chant Your holy name? When will my voice choke up, and when will the hairs of my body stand on end at the recitation of Your name?
 

O My Krishn...O My Shyamsundar...O My Govinda.... I am Your eternal servitor, yet somehow or other I have fallen into the ocean of birth and death. Please pick me up from this ocean of death and place me as one of the atoms at Your lotus feet....
 

!! Jai Jai Shree Shyamsundar Ji !!

!! Jai Jai Shree Gaura Nitai !!

Sunday, May 30, 2010

!! जब स्वयं महादेव शिव शंभु ने बाल गोपाल के दर्शन हेतु योगी वेश धारण किया !!



श्री श्यामसुंदर तो महादेव शिव शंभु के आराध्य देव हैं, और प्रभु के हर अवतार में वे प्रभु के बाल रूप का दर्शन अवश्य करते हैं....सो इस बार भी महादेव शिव शंभु को श्री श्यामसुंदर के बाल रूप के दर्शन करने की ईच्छा हुई और वे एक योगी का भेष  बनाकर मैया यशोदा के द्वार गोकुल  में नन्दभवन के बाहर पहुँच कर इसप्रकार आवाज़ लगाते हैं…


योगी भेषधारी शिव शंभु : "अलख निरंजन......अलख निरंजन....कहाँ हो प्रभु?"


और फिर इसप्रकार गाने लगते हैं...


"एक योगी आयो री तेरे द्वार....दिखा दे मुख लाल का…
ओ मैया दिखा दे मुख लाल का…"


"तेरे पालने में पालनहार, दिखा दे मुख लाल का…
ओ मैया दिखा दे मुख लाल का…"


"लिए अंखियो में प्यास, योगी करे अरदास...
ओ मैया दिखा दे मुख लाल का…"


"मैया ऐसो संजोग ना टाल, दिखा दे मुख लाल का…
ओ मैया दिखा दे मुख लाल का…"


"तेरे भरे रहेंगे भंडार, दिखा दे मुख लाल का…
ओ मैया दिखा दे मुख लाल का…"


मैया यशोदा उस समय श्री श्यामसुंदर को नहला धुला कर उनका श्रृंगार करने में व्यस्त थी और बाहर खड़े योगी की आवाज़ न सुन पायी...


योगी भेषधारी शिव भोले ने फिर से आवाज़ लगाई.... लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया...तभी वहाँ से एक ब्रज की वृद्धा गोपी गुजर रही थी….उसने उस योगी को प्रतीक्षारत देखा तो उनके पास गयी...और इस प्रकार कहने लगी…


गोपी : "बाबा....किसे बुला रहे हों? "


योगी : "गृहस्वामिनी को माई "


गोपी : "भिक्षा चाहिए ?"


योगी : " हाँ! माई"


गोपी : "यहाँ तो कोई नहीं दिखता, चलो मेरे घर....वहाँ तुम्हे भिक्षा मिल जाएगी....मैं तुम्हे भिक्षा दूंगी"


योगी : "तुम! माई?"


गोपी : "हाँ! अन्न, वस्त्र , धन...तुम जो मांगोगे वही दूंगी"


योगी : "नहीं माई, मेरा एक नियम है, कि मैं एक ही द्वार पर जाकर अलख जगाता हूँ....और यदि उस द्वार से कुछ मिल जाये तो अच्छा है....अन्यथा उस दिन किसी दुसरे द्वार पर नहीं जाता"


गोपी : "हे भगवान् ! तो फिर भूखे ही रहोगे?"


योगी : "हाँ! माई, जैसी प्रभु की इच्छा"


गोपी : "नहीं नहीं बाबा , हमारे गाँव से कोई साधु भूखा चला जाये तो यह सारे गोकुल के लिए लज्जा की बात बन जाये….बाबा तुम यहीं ठहरो….मैं अंदर जाकर देखती हूँ , कि यशोदा रानी कहाँ हैं…."


ऐसा कह वह वृद्धा गोपी नन्दभवन के अंदर चल जाती हैं और देखती है की मैया यशोदा तो श्यामसुंदर का श्रृंगार कर रही थी और उन्हें लोरी गा कर सुला रही थी…


और इधर बाहर खड़े योगी भेषधारी भगवान शंकर ने मन ही मन कहा… ”प्रभु, दर्शन किये बैगैर तो नहीं जाऊँगा”


गोपी अंदर जाकर मैया यशोदा से कहती हैं : "ओ यशोदा रानी”


मैया यशोदा : "आओ काकी, क्या बात है?"


गोपी : "यशोदा रानी....तेरे द्वार पर एक योगी कब से भिक्षा के लिए खड़ा है….तुने उसकी आवाज़ नहीं सुनी क्या?"


मैया यशोदा : "नहीं तो"


गोपी : "अरी जल्दी से उसे भिक्षा दे दे… कोई बड़ा महात्मा लगता है"


मैया यशोदा : "अच्छा"


गोपी : "ऐसा योगी मैंने कभी नहीं देखा…उसके मुख पर तो आँख ही नहीं टिकती"


मैया यशोदा : "क्यों ?"


गोपी : " अरी! इतना तेज है उसके ललाट पर कि जैसे सूर्य का तेज होता है….और देखो कितना कड़ा नियम है उसका....जिस द्वार पर भिक्षा के लिए खड़ा हो जाता है बस वही से भिक्षा लेता है…और भिक्षा न मिलने पर भूखा ही लौट जाता है"


मैया यशोदा : "काकी.... आटा, चावल, दाल, गुड, घी ये सब कुछ ले लिया है…दो चार दिन के लिए प्रयाप्त होगा....अब चलो"


गोपी : "अरी! दक्षिणा के लिए कुछ धन भी ले ले…बड़े दिव्य मूर्ति हैं....उसे प्रसन्न कर ले, आशीर्वाद पायेगी"


मैया यशोदा : " ओह! दक्षिणा तो मैं भूल ही गयी अभी लाती हूँ"


फिर मैया यशोदा संदूक से धन और एक मोती की माला निकलते हुए कहती हैं : " काकी.... बड़ी दिव्यआत्मा है न....तो लो ये बहुमूल्य मोती की माला ही दे देती हूँ"


इधर बाहर शिव शंभु खड़े खड़े अपने ही मन ही मन में श्यामसुन्दर से इस तरह बाते कर रहे थे : ” प्रभु! दर्शन देने में इतना संकोच ? ”


श्यामसुंदर ने उनके अंतर्मन में कहा : "धन्य भाग्य, जो आप स्वयं अपने सेवक के घर पधारे....सेवक का प्रणाम स्वीकार करे"


योगी भेषधारी शिव शंभु : " कौन सेवक हैं और कौन प्रभु.... इसके निर्णय का ये समय नहीं है…आप तो हमे, अपना परम भक्त जान कर अपने बाल रूप के दर्शन करा दीजिये बस"


श्यामसुंदर ने फिर से कहा : “बाल रूप तो इस समय मैया यशोदा के पास गिरवी रखा है....उन्ही से मांगना पड़ेगा…आहा ! लीजिये, मैया आ गयी"


मैया यशोदा श्यामसुंदर को पालने में सुलाकर और दक्षिणा की थाल लेकर उस वृद्धा गोपी के साथ नन्दभवन के बाहर आती है, जहा योगी भेष में शिव शंभु प्रतीक्षा कर रहे थे.....मैया यशोदा ने योगी भेषधरी शिव शंभु को प्रणाम करते हुए कहने लगी"


मैया यशोदा : "विलम्ब के लिए क्षमा करे बाबा.... मैं अपने लल्ला के श्रृंगार में व्यस्त थी"


योगी भेषधारी शिव शंभु : "धन्य हो तुम मैया....जिसने ऐसे दिव्य बालक की सेवा का सौभाग्य प्राप्त हुआ....माता मुझे भी उस परम दिव्य शिशु के दर्शन करवा दो"


मैया यशोदा:  "क्षमा करे बाबा...अभी अभी नहलाया है उसे...इस समय मैं उसे बाहर नहीं ला सकती....ठंडी हवा लग जाएगी"


योगी भेषधारी शिव शंभु : "मैया, हवाओं का चलना न चलना, जिसके संकल्प मात्र पर निर्भर है, उसके लिए व्यर्थ की शंका मत करो…उसे एक बार मेरे पास लेकर आओ....उसके दर्शनों की लालसा में ही मैं तेरे द्वार पर आया हूँ"


मैया यशोदा : "नहीं योगी बाबा...मैं उसे बाहर नहीं ला सकती इसलिए.....अब यह भिक्षा ग्रहण कीजिये और मुझे क्षमा कीजिये"


योगी भेषधारी शिव शंभु भिक्षा की उस थाल को देख कर इस प्रकार मैया यशोदा से कहने लगे : "मैया! ये मोती माणक, धन तो मेरे लिए पत्थर के टुकड़े है ...मेरे किस काम के? मुझे इनका लोभ नहीं, चाहो तो ऐसे हीरे, मोती, माणक मुझसे ले लो...पर मुझे तेरे लल्ला का दर्शन करवा दो, वही हमारी भिक्षा है"


फिर योगी भेषधारी भगवान् शंकर ने अपने कमंडल से हीरे मोती निकाल कर मैया यशोदा जी के भिक्षा की थाल में रख दिए…. जिसे देख मैया यशोदा आश्चर्य चकित और चिंतित हो उस वृद्ध गोपी से कहने लगी...


मैया यशोदा : "काकी....ये कोई असली साधु नहीं….कोई मायावी है"


और वो वृद्धा गोपी मूक खड़ी यशोदा मैया का करुण चेहरा देखती रही...


फिर मैया यशोदा अपने आँखों में अश्रु भर के योगी भेषधारी शिव शंभु से इसप्रकार कहने लगी : "देखो योगी बाबा....तुम जैसे कई मायावी इससे पहले भी आ चुके है.. सभी इसी प्रकार की चिकनी चुपरी बाते करते है….तेरा लाल तो बड़ा दिव्य बालक है....उसका दर्शन करा दे....उसे मेरी गोद में दे दे...और फिर सब के सब उसका अनिष्ट करने की चेष्टा करते है....मेरे लाल ने आप लोगो का क्या बिगाड़ा है...जो आप लोग उसके शत्रु बन गए"


और फिर बहुत ही कड़े शब्दों में मैया यशोदा ने कहा : "भिक्षा चाहिए तो लीजिये, अन्यथा अपने स्थान को पधारिये...मैं अपने लल्ला को बाहर नहीं लाऊंगी"


योगी भेषधारी शिव शंभु : "ओ मैया! ऐसे कठोर मत बनो...मैं बहुत दूर कैलाश पर्वत से आया हूँ"


मैया यशोदा फिर कठोर शब्दों में बोली : "कैलाश में थे, तो वहीँ भगवान शिव के साक्षात् दर्शन कर लिए होते ....यहाँ क्या काम है?"


योगी भेषधारी शिव शंभु : "भोली मैया! भगवन के साक्षात् दर्शन करना तो कोई कठिन कार्य नहीं हैं.....परन्तु उनके बाल स्वरुप के दर्शन करना अत्यंत दुर्लभ हैं ..उसी की लालसा में मैं तेरे द्वार पर आया हूँ…कई युगों के पश्चात् ही यह दर्शन मिलते है.."


मैया यशोदा : "नहीं नहीं योगी बाबा...मुझे क्षमा करो..मैं उसे बाहर नहीं लाऊंगी…मेरे पति की आज्ञा है, कि किसी भी अनजान व्यक्ति के सामने अपने लल्ला को मत लाना"


मैया यशोदा को इस प्रकार अपने फैसले पर अडिग देख भगवान् श्यामसुंदर ने श्री योगमाया को पूरनमासी भुआ ( पूरनमासी भुआ...जो कि स्वयं भगवती योगमाया हैं....भगवान के जनम के पूर्व से ही गोकुल में आ गयी थी ) के रूप में उस स्थान पर भेजा...जहाँ पर यह वाद-विवाद चल रहा था.


पूरनमासी भुआ : "ये अनजान व्यक्ति नहीं हैं यशोदा रानी...ये अनजान व्यक्ति नहीं हैं....मैं इन्हें अच्छी प्रकार से जानती हूँ…मैंने कहा था न कि गोकुल में आने के पहले मैं काशी में रहती थी…वही इनके दर्शन किये थे…हाँ, ये सचमुच परम दिव्य शक्ति हैं.....शक्ति पति हैं ये.....शक्ति पति हैं ये…."


ऐसा कहते हुए पूरनमासी भुआ....आँखों में अश्रु की धार लिए भगवान् शिव के चरणों में अपना शीश रख उन्हें प्रणाम करती हैं… और उठ कर मैया यशोदा से इसप्रकार कहती है : "यशोदा! इन्हें लल्ला के दर्शन करा दे....यशोदा रानी....इन्हें लल्ला के दर्शन करा दे....इनका आशीर्वाद पाकर तेरा लल्ला भी बड़ा प्रसन्न हो जायेगा"


मैया यशोदा विस्मृत सी मुद्रा में पूरनमासी भुआ से बोली : " पूरनमासी भुआ! क्या तुम सच कह रही हो? तुम इन्हें जानती हो?"


पूरनमासी भुआ : "हाँ री , यशोदा रानी! मैं इन्हें भली-भाँति जानती हूँ….अरी! यह तो तेरा सौभाग्य है जो तेरे लल्ला का प्रेम इन्हें तेरे द्वार पर ले आया"


मैया यशोदा : "परन्तु....इनकी भेष-भूषा तो देखिये…लम्बी लम्बी जटाए....बदन में भभूत और गले में सर्पों की माला लगाये हुए है… लल्ला तो इनको देख कर वैसे ही डर जाएगा....ना बाबा ना…मैं लल्ला को नहीं लाऊंगी"


बिचारी भोली भाली मैया को क्या पता की उनके द्वार पर स्वयं भगवान सदाशिव पधारे हैं...


मैया यशोदा से ऐसा सुन पूरनमासी भुआ ने कहा : "नहीं यशोदा रानी…इनके दर्शन मात्र से ही समस्त भयों का नाश हो जाता है....समस्त बाधाये दूर हो जाती हैं...मुझपर विश्वास करो....मैं कभी तुमसे झूठ नहीं बोली"


फिर वो वृद्धा गोपी ने पूरनमासी भुआ का समर्थन करते हुए कहा : " अरी! यशोदा रानी, ये पूरनमासी भुआ कभी झूठ नहीं बोलती…यशोदा रानी याद है तुम्हे …जब वो पहले पहले गोकुल में आई थी तब इसी ने तुझे आशीर्वाद दिया था ना कि तुम्हे भी लल्ला होगा... उस समय तुम सब लोग तो आशा छोड़ चुके थे…ये सदा सच कहती है.. सो इसकी बात मान ले बेटी"


पूरनमासी भुआ : "जा बेटी जा, लल्ला को ले आ"


मैया यशोदा : "पर मैं लल्ला को इनके हाथ में नहीं दूंगी"


पूरनमासी भुआ : " अच्छा लल्ला को तो ले आ....ये दूर से ही आशीर्वाद दे देंगे.…जा जा ले आ लल्ला को यशोदा बेटी"


फिर मैया यशोदा नन्दभवन के अन्दर जाती हैं, श्यामसुंदर को लाने के लिए…और अंदर जाकर श्यामसुंदर को अपनी गोद में उठा इस प्रकार कहती है : “ अरे ओ लल्ला...चल कोई तेरे दर्शन के लिए आये हैं…चल…"


ऐसा कह मैया यशोदा श्यामसुंदर को बाहर ले आती हैं.…जिसे देख, योगी भेषधारी शिव शंभु प्रेम से गद गद हो, श्यामसुंदर के बाल स्वरुप को टकटकी लगाये निहारने लगे....जैसे पूर्णिमा की रात को चकोर चाँद को टकटकी लगाये निहारते रहता है…


इसी बीच मैया यशोदा कहती है : "लो योगी बाबा....लल्ला को देख लो, और आशीर्वाद दे दो"


भगवान् शिव शम्बू अपने प्रिय श्यामसुंदर के इस बाल स्वरुप को देख उन्हें नमस्कार करते हैं....और श्यामसुंदर भी चेहरे पर मधुर मधुर मुस्कान लिए उन्हें देखते रहते हैं....और फिर शिव शंभु मैया यशोदा से इस प्रकार कहते हैं...


योगी भेषधारी शिव शंभु :  "मैया! आज्ञा हो तो इनके चरणों में अपना मस्तक रख लू?"


मैया यशोदा : "नहीं नहीं! मैं मेरे लल्ला को छुने नहीं दूंगी"


फिर पूरनमासी भुआ योगी भेषधारी शिव शंभु से कहती है : "पहले अपनी चरण रज तो दीजिये"


ऐसा कह पूरनमासी भुआ, शिव शंभु की चरण रज ले लल्ला श्यामसुंदर के ललाट पर लगा देती है....


शिव शंभु की चरण रज श्यामसुंदर के ललाट में पड़ते ही....श्यामसुंदर मन ही मन में शिव शंभु से कहते है : "धन्यवाद प्रभु ! कोटिशः धन्यवाद"


अंतर्यामी भगवान् शिव, श्यामसुंदर की मन की बात को सुनकर इस प्रकार कहते है : “ ये कहाँ का न्याय है स्वामी ....कि हम इतनी दूर से आकर भी आपके बाल रूप का आलिंगन भी ना कर सके? जिन श्री चरणों से निकली पवित्र गंगा को हम अपने शीश पर धारण करते हैं...उन श्री चरणों को एक बार तो छु लेने दीजिये प्रभु?


और फिर भगवान शिव शंभु अपने ही शरीर के एक अदृश्य प्रतिबिम्ब से श्री श्यामसुंदर के चरणों का स्पर्श करते हैं….और उनकी स्तुति पुरुषसूक्त से करते हैं...जो कि भगवान श्री श्यामसुंदर को अति प्रिय हैं...


उसके बाद योगी भेषधारी शिव शंभु मैया यशोदा से झूम झूम के नाच नाच कर कहते है : "युग युग जीये तेरो लल्ला...ओ मैया…युग युग जीये...."


"मेरे नयना भये रे निहाल, निरख मुख लाल का…
प्यासी अँखियाँ हुई रे निहाल, निरख मुख लाल का…"


फिर मैया यशोदा कहती हैं : " योगी बाबा अपनी भिक्षा तो लेते जाएये"


महादेव शिव शंभु ने झूमते हुए गाते हुए कहा :


"रख ले हीरे मोती तेरे, ये पत्थर किस काम के मेरे...
योगी हो गया माला माल, निरख मुख लाल का…


मैं तो हो गया माला माल, निरख मुख लाल का…"


ऐसा कहते ही…योगी भेषधारी शिव शंभु वहां से अंतर्ध्यान हो जाते हैं…


ऐसा अनुपम दृश्य देख स्वर्ग लोक से समस्त देवी देवता प्रसन्न हो पुष्प की वर्षा करने लगते हैं.....



ऐसे ही है हमारे प्यारे श्यामसुंदर जी.....सबका मन मोहने वाले......हमारे प्रिय श्री धाम वृन्दावन के श्री श्यामसुंदर जी के श्री विग्रह का यह अद्भुत योगी भेष हमें इसी दिव्य कथा कि स्मृति कराता हैं...


!! जय जय योगी भेष धारी श्री श्याम सुन्दर जी !!
!! जय जय महादेव शिव शंभु जी !!

!! श्री कृष्ण शरणम ममः !! : Shri Krishna Shranam Mamah

        
      !! श्री कृष्ण शरणम ममः !!

धन अकिंचन का श्री कृष्ण शरणम ममः।
लक्ष्य जीवन का श्री कृष्ण शरणम ममः।

दीन दुःखियों का, निर्बल जनों का सदा, दृढ सहारा है श्री कृष्ण शरणम ममः।
वैष्णवों का हितैषी, सदन शांति का, प्राण प्यारा है श्री कृष्ण शरणम ममः।

काटने के लिये मोह जंजाल को, तेज तलवार श्री कृष्ण शरणम ममः।
नाम ही मंत्र है मंत्र ही नाम है, है महामंत्र श्री कृष्ण शरणम ममः।

छूट जाते है साधन सभी अंत में, साथ रहता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
साथी दुनिया में कोई किसी का नही, सच्चा साथी है श्री कृष्ण शरणम ममः।

तरना चाहो जो संसार सागर से तो, पार कर देगा श्री कृष्ण शरणम ममः।
शत्रु हारेंगे होगी विजय आपकी , याद रखना है श्री कृष्ण शरणम ममः।

सुख मिलेगा सफलता स्वयं आयेगी, तुम जपो नित्य श्री कृष्ण शरणम ममः।
पूरे होंगे मनोरथ सभी सर्वदा, जो न भूलोगे श्री कृष्ण शरणम ममः।

दीनबंधु कृपासिंधु गोविन्द के, प्रेम का सिंधु श्री कृष्ण शरणम ममः।
दुःख दारिद्र दुर्भाग्य को मेट कर, देता सौभाग्य श्री कृष्ण शरणम ममः।

ब्रह्मा-विष्णु-महेश भी प्रेम से, नित्य जपते हैं श्री कृष्ण शरणम ममः।
शेष सनकादि नारद विषारद सभी , रट लगाते हैं श्री कृष्ण शरणम ममः।

मंत्र जितने भी दुनिया में विख्यात हैं, मूल सबका है श्री कृष्ण शरणम ममः।
पानो चाहो जो सिद्धि अनायास है, वे जपें नित्य श्री कृष्ण शरणम ममः।

भक्त दुनिया में जितने हुए आजतक, सबका आधार श्री कृष्ण शरणम ममः।
लट्टुओं की तरह विश्व के जीव हैं, काम विद्युत का श्री कृष्ण शरणम ममः।

दुष्ट राक्षस डराने लगे जिस समय, बोले प्रहलाद श्री कृष्ण शरणम ममः।
राणा बोले कि रक्षक तेरा कौन है, मीरा बोली कि श्री कृष्ण शरणम ममः।

बोलो श्रद्धा से, विश्वास से, प्रेम से, कृष्ण श्री कृष्ण श्री कृष्ण शरणम ममः।
प्राणवल्लभ के वल्लभ हैं वल्लभ प्रभु, उनका वल्लभ है श्री कृष्ण शरणम ममः।

दुख मिटाता है देकर सहारा सदा, सुख बढाता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
धाम आनंद का, नाम गोविन्द का, सिंधु रस का है श्री कृष्ण शरणम ममः।

जग में आनन्द अक्षय अचल संपदा, नित्य देता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
पांडवों की विजय क्यों हुई युद्ध में, उसका कारण है श्री कृष्ण शरणम ममः।

द्रौपदी का सहारा यही एक था, नित्य जपती थी श्री कृष्ण शरणम ममः।
ब्रज के गोपों का गोपीजनों का सदा, एक आश्रय था श्री कृष्ण शरणम ममः।

वल्लभाचार्य का विट्ठलाधीश का, मूल साधन था श्री कृष्ण शरणम ममः।
पुष्टीमार्गीय वैष्णव जनों के लिये, प्राणजीवन है श्री कृष्ण शरणम ममः।

लाभ लौकिक-अलौकिक विविध भांति के, सबसे बढकर है श्री कृष्ण शरणम ममः।
क्षीण हो जाते हैं पुण्य सब भांति के, किंतु अक्षय है श्री कृष्ण शरणम ममः।

काम सुधरेंगे सब लोक परलोक के, तुम जपोगे जो श्री कृष्ण शरणम ममः।
बल है निर्बल का, निर्धन का धन है यही, गुन है निर्गुण का श्री कृष्ण शरणम ममः।

यह असम्भव को संभव बनाता सदा, शक्तिशाली है श्री कृष्ण शरणम ममः।
कोई अन्तर नही नाम में रूप में, है स्वयं कृष्ण श्री कृष्ण शरणम ममः।

जिनको विश्वास नही वे भटकते रहें, हम तो जपते हैं श्री कृष्ण शरणम ममः।
खिन्नता , हीनता और पराधीनता, सब मिटाता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

भाग जाता है भय, होता निर्भय हृदय, याद आते ही श्री कृष्ण शरणम ममः।
दूर रखता है दुःसंग से सर्वदा, देता सत्संग श्री कृष्ण शरणम ममः।

रंग अद्भुत चढाता है सत्संग का, संग रहता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
कृष्ण का प्यार, पीयूष की धार है, शास्त्र का सार श्री कृष्ण शरणम ममः।

काम को, क्रोध को, मोह को, लोभ को , नष्ट करता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
मेट दुख-द्वन्द, भव-फन्द छल-छंद सब, देता आनन्द श्री कृष्ण शरणम ममः।

पाप का, ताप का, क्लेश का, द्वेष का, नाश करता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
ज्ञान ध्यानादि से, योग यज्ञादि से , सबसे बढकर है श्री कृष्ण शरणम ममः।

है अहोभाग्य उसके जिसे अन्त में, याद आता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
धन्य है भक्त वह जिसके मन में सदा, वास करता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

कृष्ण बसते हृदय में उसी भक्त के, जो भी जपता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
छूट जाते हैं धन-जन-भवन एक दिन, साथ जाता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

बस जरूरत है श्रद्धा की, विश्वास की, कल्पतरु ही हैं श्री कृष्ण शरणम ममः।
चलते फिरते जपो या जपो बैठकर, है सफल मंत्र श्री कृष्ण शरणम ममः।

चाहे अन्दर जपो, चाहे बाहर जपो,अंतर्यामी है श्री कृष्ण शरणम ममः।
आज तक जो किये हैं सुकृत आपने, फल हे उनका श्री कृष्ण शरणम ममः।

थक गये हैं जो जग में भटक कर उन्हे, देता विश्राम श्री कृष्ण शरणम ममः।
जग में जितने भी साधन हैं छोटे बडे, सबका स्वामी है श्री कृष्ण शरणम ममः।

जाना चाहो जो लीला में श्री कृष्ण की, तो जपो नित्य श्री कृष्ण शरणम ममः।
शुद्धि करनी हो जीवन की, मन की तुम्हे, तो जपो नित्य श्री कृष्ण शरणम ममः।

गेय श्रद्धेय है ये अनुपमेय है, है स्वयं श्रेय श्री कृष्ण शरणम ममः।
मन की ममता अहंता अभी मेट कर, समता देता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

कृष्ण होते प्रकट अपने जन के निकट, नित्य रटते जो श्री कृष्ण शरणम ममः।
दुनिया झुकती है चरणों में उनके सदा, नित्य जपते जो श्री कृष्ण शरणम ममः।

शुद्धि करता है अन्तःकरण की सदा, बुद्धि देता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
भ्रांति हरता है सिद्धांत के ज्ञान से, क्रांतिकारी है श्री कृष्ण शरणम ममः।

भक्ति का ज्ञान का और वैराग्य का, भाव भरता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
बन्द आँखों को सत्संग के ज्ञान से, खोल देता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

दो सो बावन ओ चौरासी वैष्णव सभी, नित्य जपते हैं श्री कृष्ण शरणम ममः।
पुष्टिमार्गीय वैष्णव करोडों हैं जो, नित्य जपते हैं श्री कृष्ण शरणम ममः।

सेवा उत्तम है सब में सदा मानसी, श्रेष्ठ सुमिरन है श्री कृष्ण शरणम ममः।
कोई झंझट नही कोई खटपट नही, सीधा सादा है श्री कृष्ण शरणम ममः।

चस्का लग जाये रस का तो कहना ही क्या, अपने बस का है श्री कृष्ण शरणम ममः।
कृष्ण के प्रेम का, नेम का, क्षेम का, केन्द्र सबका है श्री कृष्ण शरणम ममः।

अपने गौरव तराजू में साधन सभी, तोल देता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
ज्ञान का, ध्यान का, मान सम्मान का, दान देता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

मानसी सिद्ध करता है सद्भाव की, वृष्टि करता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
ब्रह्म साकार भी है निराकार भी, सिद्ध करता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

मर्म समझाता है वेद के भेद का, खेद हरता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
सच्चे वैष्णव की ये मुख्य पहचान है, नित्य जपता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

वृद्धि करता है आयुष्य आरोग्य की, यह रसायन है श्री कृष्ण शरणम ममः।
मेट देता है भ्रम और संशय सभी, सिद्ध सदगुरु है श्री कृष्ण शरणम ममः।

बीज दुनिया में होता है हर चीज जा, भक्ति का बीज श्री कृष्ण शरणम ममः।
चारों युग में और चौदह भुवन में सदा, सर्व व्यापक है श्री कृष्ण शरणम ममः।

मन को निर्मल बना भगवदीय को , देता रस दान श्री कृष्ण शरणम ममः।
सुहृदय के हिंडोले में श्री कृष्ण को, नित झुलाता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

रास के जो रसिक हैं उन्हे पास में, नित बुलाता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
आस विश्वास रखते हैं जो कृष्ण में , दास जपते हैं श्री कृष्ण शरणम ममः।

अन्याश्रय से डरते हैं वैष्णव सदा, उनका आश्रय है श्री कृष्ण शरणम ममः।
प्रेम बाजार में सदगुरु जो हरि, रत्न देता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

तोला जाता नही मोल बिकता नही, रत्न अनमोल श्री कृष्ण शरणम ममः।
भाग्यशाली भगवदीय जन ही सदा, प्राप्त करते हैं श्री कृष्ण शरणम ममः।

जो कृपा पात्र हैं बस उन्ही के लिये, है ये वरदान श्री कृष्ण शरणम ममः।
है बडे भाग्य उनके जिसे मिल गया, देव दुर्लभ है श्री कृष्ण शरणम ममः।

मिल गया है जिन्हे वे सुने ध्यान से, वे धरोहर हैं श्री कृष्ण शरणम ममः।
है ये गोलोक का मार्गदर्शक सखा, नित्य रटना है श्री कृष्ण शरणम ममः।

जेबकतरों, अविश्वासियों से सदा, गुप्त रखना है श्री कृष्ण शरणम ममः।
छोड देते हैं अपने सभी लोग तब, साथ देता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

टूट जते हैं ममता के धागे सभी, साथ देता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
पर्दा हटाता है दिल में अज्ञान का, कृष्ण बनता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

देखता है न अपराध जन का कभी, है क्षमाशील श्री कृष्ण शरणम ममः।
रंग की , धोप के, धन की, परवाह नही, प्रेम चाहता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

दूर हरि से न हरिजन रहे एक भी, चाहता है यह श्री कृष्ण शरणम ममः।
माता करती हिफाजत उसी तौर से , रक्षा करता है श्री कृष्ण शरणम ममः।


आप उनके बनें वे बने आपके, यही कहता है श्री कृष्ण शरणम ममः।
भक्त सोता है तब भी स्वयं जाग कर, पहरा देता है श्री कृष्ण शरणम ममः।

चाहे मानो न मानो खुशी आपकी, सच्चा धन तो है, श्री कृष्ण शरणम ममः।
डर नही है किसी द्वेत का, प्रेत का , शुद्धद्वैत श्री कृष्ण शरणम ममः।


यह सीधी सडक चल पडो बेधडक, साथ रक्षक है श्री कृष्ण शरणम ममः।
हारते हे नही वे कहीं भी कभी, नित्य जपते जो श्री कृष्ण शरणम ममः।

श्याम सुंदर निकुंजों में मिल जायेगें, ढूंढ लायेगा श्री कृष्ण शरणम ममः।
दुनिया सपना है अपना न कोई यहाँ , नित्य जपना है श्री कृष्ण शरणम ममः।

सत्य शिव और सुन्दर है सर्वस्व जो, वो है नवनीत श्री कृष्ण शरणम ममः।

धन अकिंचन का श्री कृष्ण शरणम ममः।
लक्ष्य जीवन का श्री कृष्ण शरणम ममः।

        !! श्री कृष्ण शरणम ममः !!

Friday, May 28, 2010

!! श्री राधा कृष्णा का गन्धर्व विवाह !! : Shree Radha Krishna's Gandhrava Marriage


           ------------!! जय जय श्री राधे - जय जय श्री कृष्णा !!-----------------

हम में से बहुत से लोग यही जानते हैं कि राधाजी श्रीकृष्ण की प्रेयसी थीं परन्तु इनका विवाह नहीं हुआ था। श्रीकृष्ण के गुरू गर्गाचार्य जी द्वारा रचित "गर्ग संहिता" में यह वर्णन है कि राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था।

एक बार नन्द बाबा कृष्ण जी को गोद में लिए हुए गाएं चरा रहे थे। गाएं चराते-चराते वे वन में काफी आगे निकल आए। अचानक बादल गरजने लगे और आंधी चलने लगी। नन्द बाबा ने देखा कि सुन्दर वस्त्र आभूषणों से सजी राधा जी प्रकट हुई।

श्रीगर्ग ऋषि नन्द बाबा को श्री कृष्णा के भगवतिय स्वरुप के बारे में बताते हुए

नन्द बाबा ने राधा जी को प्रणाम किया और कहा कि वे जानते हैं कि उनकी गोद मे साक्षात श्रीहरि हैं और उन्हें गर्ग जी ने यह रहस्य बता दिया था। भगवान कृष्ण को राधाजी को सौंप कर नन्द बाबा चले गए।

तब भगवान कृष्ण युवा रूप में आ गए। वहां एक विवाह मण्डप बना और विवाह की सारी सामग्री सुसज्जित रूप में वहां थी। भगवान कृष्ण राधाजी के साथ उस मण्डप में सुंदर सिंहासन पर विराजमान हुए। तभी वहां ब्रम्हा जी प्रकट हुए और भगवान कृष्ण का गुणगान करने के बाद कहा कि वे ही उन दोनों का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न कराएंगे। ब्रम्हा जी ने वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ विवाह कराया और दक्षिणा में भगवान से उनके चरणों की भंक्ति मांगी। विवाह संपन्न कराने के बाद ब्रम्हा जी लौट गए।

नवविवाहित युगल ने हंसते खेलते कुछ समय यमुना के तट पर बिताया। अचानक भगवान कृष्ण फिर से शिशु रूप में आ गए। राधाजी का मन तो नहीं भरा था पर वे जानती थीं कि श्री हरि भगवान की लीलाएं अद्भुत हैं। वे शिशु रूपधारी श्री कृष्ण को लेकर नन्द बाबा को दे दिया। राधा जी उम्र में श्रीकृष्ण से बडी थीं।

यदि राधा-कृष्ण की मिलन स्थली की भौगोलिक पृष्ठभूमि देखें तो नन्द गांव से बरसाना 7 किमी है तथा वह वन जहाँ ये गायें चराने जाते थे नंद गांव और बरसाना के ठीक मघ्य में है। जिसे भंडिरा वन कहा जाता है।


          उस गन्धर्व विवाह का साक्षी भंडिरावट आज भी भंडिरावन में स्थित हैं.


Brahma Ji performed the gandharva marriage of Shri Radha-Krishna Yugala beneath the banyan tree called Bhandrivata in Bhandrivana....

According to the Garga samhita and Gita-govinda, Nanda Baba once took Shri Krishna to Bhandrivana to graze the cows.... This forest was very attractively covered with the dense foliage of the tamäla and kadamba trees and the lush creepers, and therefore it was only lit by scant sunrays....

Suddenly, black clouds gathered from all directions and a raging rainstorm developed.... Darkness pervaded. Nanda Baba became frightened of the bad omen and carefully hid Kanhaiya on his lap....

At that moment, the extraordinarily beautiful daughter of Vrishabhanu Maharaja, Shri Radhika, appeared there in the form of a young girl....

She held Her hands out to Nanda Bäba, indicating that She wanted to take Krishna with Her.....The astonished Nanda Baba gave Shri Krishna to Her. Radhika then took Krishna to the inner part of Bhandriavana under the shelter of Bhandrivata....

Here Shri Krishna manifested himself as manmatha-manmatha kisora, a beautiful youth who bewilders even the mind of Cupid.... Meawhile, Lalita, Visäkhä and the other sakhis also appeared here with Caturmukha Brahmä. Knowing the desire of Kisora-Kisori, Brahmä performed Their gandharva wedding by reciting Vedic mantras...

Shri Radhika and Shri Krishna exchanged beautiful flower garlands.... The delighted sakhis sang wedding songs as the demigods showered flowers from the sky.... While everyone looked on, Brahma left that place. The sakhis also disappeared, and Krishna again assumed the form of a small boy. Shri Radhika took Krishna by hand and returned to Nanda Baba, who was standing waiting for Him. Meanwhile, the clouds dispersed and the storm abated....


After that Nanda Bäbä returned with Krishna to his Nandagaon....
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The Bhandiravata in Bhandiravana Near Nandgaon Where the Yugal Jodi Radha Krishna's Gandharava Marriage performed...

" In India, the parents generally select the husband or wife for their daughter or son.... The gändharva marriage, however, takes place by personal selection. In a gändharva wedding, there is no lengthy ceremony.... The bride and groom need only exchange garlands and simple marriage vows..."

    -----------!! Jay Jay Shri Radhe - Jay Jay Shri Krishna !!--------------

Thursday, May 27, 2010

श्रीधाम वृंदावन के श्री राधारमण देव जी का प्राकट्य दिवस

आज हम सभी के प्रिय श्रीधाम वृंदावन के श्री राधारमण देव जी का प्राकट्य दिवस हैं....इस पावन दिवस की उपलक्ष्य में आइये हम सभी मिल श्री राधारमण जी के श्री चरणों में अपने प्रेम और श्रद्धा रूपी फुल अर्पित करते हुए, उनको अपने हृदय से शुक्रिया अदा करते हैं, कि उन्होंने अपने श्री चरणों का अनुराग हमे प्रदान किया....और हम निःशक्त जनों पर अपनी परम कृपा बनाये रखी...


मुझे तुमने दाता बहुत कुछ दिया हैं....
तेरा शुक्रिया हैं.....तेरा शुक्रिया.....

मुझे है सहारा तेरी बंदगी का....
हैं जिसपर गुजारा मेरी ज़िन्दगी का...
मिला मुझको जो कुछ तुम्ही से मिला हैं....
तेरा शुक्रिया हैं.....तेरा शुक्रिया.....

मुझे तुमने दाता बहुत कुछ दिया हैं....
तेरा शुक्रिया हैं.....तेरा शुक्रिया.....

न मिलती अगर, दी हुई दाद तेरी....
तो क्या थी जमाने में, औकात मेरी...
तुम्ही ने तो जीने के काबिल किया हैं...
तेरा शुक्रिया हैं.....तेरा शुक्रिया.....

किया कुछ न मैंने, शर्मसार हूँ मैं...
तेरी रहमतो का, तलबदार हूँ मैं...
दिया कुछ नहीं बस, लिया ही लिया हैं....
तेरा शुक्रिया हैं.....तेरा शुक्रिया.....

मिला मुझको जो कुछ, बदौलत तुम्हारी...
मेरा कुछ नहीं, सब है दौलत तुम्हारी....
उसे क्या कमी, जो तेरा हो लिया हैं....
तेरा शुक्रिया हैं.....तेरा शुक्रिया.....

मेरा ही नहीं, तू सभी का हैं दाता...
तू ही सबको देता, तू ही हैं दिलाता...
तेरा ही दिया, मैंने खाया पिया हैं...
तेरा शुक्रिया हैं.....तेरा शुक्रिया.....

मुझे तुमने दाता बहुत कुछ दिया हैं....
तेरा शुक्रिया हैं.....तेरा शुक्रिया.....

हे राधा रमण मैं हूँ, तुम्हरी शरण...
हे राधा रमण मैं हूँ , तुम्हरी शरण...

तुम्हरी शरण, प्रभु तुम्हरी शरण...
हे राधा रमण मैं हूँ, तुम्हरी शरण...

!! जय जय श्री राधारमण देव जी !!

!! हे भक्त वृन्दो के प्राण प्यारे, नमामि राधे नमामि कृष्णा !!



                         !! जय जय श्री राधे कृष्णा !!

हे भक्त वृन्दो के प्राण प्यारे , नमामि राधे नमामि कृष्णा !
पितु, मात, स्वामी, सखा हमारे, नमामि राधे नमामि कृष्णा !!

हे भक्त वृन्दो के प्राण प्यारे , नमामि राधे नमामि कृष्णा !
तुम्ही हो साथी सखा हमारे , नमामि राधे नमामि कृष्णा !!

आदिशक्ति श्री राधारानी, जय जगजननी, जय कल्याणी !
युगलमूर्ति श्री राधे कृष्णा, दर्शन करत मिटे नहीं तृष्णा !!

दोनों है, दोनों के नैनो के तारे, नमामि राधे नमामि कृष्णा !
हे! भक्तवृन्दो के प्राण प्यारे, नमामि राधे , नमामि कृष्णा !!

सुरमुनि कितने सपने संजोते, योगी जप तप कर युग खोते !
तब जाकर इस युगलमूर्ति के, पूर्णरूप में दर्शन होते !!

ये सृस्ठी सारी यही पुकारे, नमामि राधे नमामि कृष्णा !!
पितु, मात, स्वामी , सखा हमारे, नमामि राधे नमामि कृष्णा !!

राधे कृष्णा राधे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा राधे राधे !!
राधे कृष्णा राधे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा राधे राधे !!

राधे कृष्णा राधे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा राधे राधे...
राधे कृष्णा राधे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा राधे राधे...

हे भक्त वृन्दो के प्राण प्यारे , नमामि राधे नमामि कृष्णा !
तुम्ही हो साथी सखा हमारे , नमामि राधे नमामि कृष्णा !!

कृष्णा sssssssss , कृष्णा ssssssss
कृष्णा कृष्णा  sssss राधे राधे ssssss

                       !! जय जय श्री राधे कृष्णा !!


!! श्री श्री राम चरित्र !! : Shri Shri Ram Charitra


मर्यादा पुरषोतम भगवान श्री राम स्वयं भगवान श्री हरि विष्णु के अवतार हैं... श्री विष्णु ने श्री राम का अवतार, इस वसुंधरा पर दुष्ट,पापी निशाचर रावण जिसने तीनो लोको में अपने पापाचार से हाहाकार मचा रखा था, उसका संहार करने के लिए लिया था.....

श्री राम एक आदर्श पुत्र हैं....पिता की आज्ञा उनके लिये सर्वोपरि है... पति के रूप में श्री राम ने सदैव एक पत्नीव्रत का पालन किया...राजा के रूप में प्रजा के हित के लिये स्वयं के हित को हेय समझते हैं....विलक्षण व्यक्तित्व है उनका....वे अत्यन्त वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान, सुंदर, पराक्रमी, दुष्टों का दमन करने वाले, युद्ध एवं नीतिकुशल, धर्मात्मा, मर्यादापुरुषोत्तम, प्रजावत्सल, शरणागत को शरण देने वाले, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता एवं प्रतिभा सम्पन्न हैं....

आइये उन्ही भगवान श्री राम के इस श्री चरित्र को इन 108 पंक्तियो की कव्यवली के माध्यम से  पढ़ते हैं और गाते हैं......जो स्वयं गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित हैं...

  
                  !! श्री  श्री राम चरित्र !!

रघुपति राघव राजाराम। पतित पावन सीताराम॥
जय रघुनन्दन जय घनश्याम। पतित पावन सीताराम॥

भीड़ पड़ी जब भक्त पुकारे। दूर करो प्रभु दु:ख हमारे॥
दशरथ के घर जन्में राम। पतित पावन सीताराम॥१॥


विश्वामित्र मुनीश्वर आए। दशरथ भूप से वचन सुनाये।
संग में भेजे लक्ष्मण राम। पतित पावन सीताराम॥२॥


वन में जाय ताड़का मारी। चरण छुआय अहिल्या तारी॥
ऋषियों के दु:ख हरते राम। पतित पावन सीताराम॥३॥


जनकपुरी रघुनन्दन आए। नगर निवासी दर्शन पाए॥
सीता के मन भाये राम। पतित पावन सीताराम॥४॥


रघुनन्दन ने धनुष चढाया। सब राजों का मान घटाया॥
सीता ने वर पाये राम। पतित पावन सीताराम॥५॥


परशुराम क्रोधित हो आए। दुष्ट भूप मन में हरषाये॥
जनकराय ने किया प्रणाम। पतित पावन सीताराम॥६॥


बोले लखन सुनो मुनि ज्ञानी। संत नहीं होते अभिमानी॥
मीठी वाणी बोले राम। पतित पावन सीताराम॥७॥


लक्ष्मण वचन ध्यान मत दीजो। जो कुछ दण्ड दास को दीजो॥
धनुष तुडइय्या मैं हूँ राम। पतित पावन सीताराम॥८॥


लेकर के यह धनुष चढाओ। अपनी शक्ति मुझे दिखाओ॥
छूवत चाप चढाये राम। पतित पावन सीताराम॥९॥


हुई उर्मिला लखन की नारी। श्रुतिकीर्ति रिपुसूदन प्यारी॥
हुई मांडवी भरत के वाम। पतित पावन सीताराम॥१०॥


अवधपुरी रघुनन्दन आए। घर-घर नारी मंगल गए॥
बारह वर्ष बिताये राम। पतित पावन सीताराम॥११॥


गुरु वशिष्ठ से आज्ञा लीनी। राजतिलक तैयारी कीनी॥
कल को होंगे राजा राम। पतित पावन सीताराम॥१२॥


कुटिल मंथरा ने बहकायी। केकैई ने यह बात सुनाई॥
दे दो मेरे दो वरदान। पतित पावन सीताराम॥१३॥


मेरी विनती तुम सुन लीजो। पुत्र भरत को गद्दी दीजो॥
होत प्रात: वन भेजो राम। पतित पावन सीताराम॥१४॥


धरनी गिरे भूप तत्काल। लागा दिल में शूल विशाल॥
तब सुमंत बुलवाये राम। पतित पावन सीताराम॥१५॥


राम, पिता को शीश नवाये। मुख से वचन कहा नहिं जाये॥
केकैयी वचन सुनायो राम। पतित पावन सीताराम॥१६॥


राजा के तुम प्राण प्यारे। इनके दुःख हरोगे सारे॥
अब तुम वन में जाओ राम। पतित पावन सीताराम॥१७॥


वन में चौदह वर्ष बिताओ। रघुकुल रीति नीति अपनाओ॥
आगे इच्छा तुम्हारी राम। पतित पावन सीताराम॥१८॥


सुनत वचन राघव हर्षाये। माता जी के मन्दिर आए॥
चरण-कमल में किया प्रणाम। पतित पावन सीताराम॥१९॥


माता जी मैं तो वन जाऊँ। चौदह वर्ष बाद फिर आऊं॥
चरण कमल देखूं सुख धाम। पतित पावन सीताराम॥२०॥


सुनी शूल सम जब यह बानी। भू पर गिरी कौशल्या रानी।
धीरज बंधा रहे श्री राम। पतित पावन सीताराम॥२१॥


समाचार सुनी लक्ष्मण आए। धनुष-बाण संग परम सुहाए॥
बोले संग चलूँगा राम। पतित पावन सीताराम॥ २२॥


सीताजी जब यह सुध पाईं। रंगमहल से निचे आईं॥
कौशल्या को किया प्रणाम। पतित पावन सीताराम॥ २३॥


मेरी चूक क्षमा कर दीजो। वन जाने की आज्ञा दीजो॥
सीता को समझाते राम। पतित पावन सीताराम॥२४॥


मेरी सीख सिया सुन लीजो। सास ससुर की सेवा कीजो॥
मुझको भी होगा विश्राम। पतित पावन सीताराम॥ २५॥


मेरा दोष बता प्रभु दीजो। संग मुझे सेवा में लीजो॥
अर्द्धांगिनी तुम्हारी राम। पतित पावन सीताराम॥ २६॥


राम लखन मिथिलेश कुमारी। बन जाने की करी तैयारी॥
रथ में बैठ गए सुख धाम। पतित पावन सीताराम॥ २७॥


अवधपुरी के सब नर-नारी। समाचार सुन व्याकुल भारी॥
मचा अवध में अति कोहराम। पतित पावन सीताराम॥२८॥


श्रृंगवेरपुर रघुबर आए। रथ को अवधपुरी लौटाए॥
गंगा तट पर आए राम। पतित पावन सीताराम॥ २९॥


केवट कहे चरण धुलवाओ। पीछे नौका में चढ़ जाओ॥
पत्थर कर दी नारी राम। पतित पावन सीताराम॥३०॥


लाया एक कठौता पानी। चरण-कमल धोये सुखमानी॥
नाव चढाये लक्ष्मण राम। पतित पावन सीताराम॥३१॥


उतराई में मुंदरी दीन्हीं। केवट ने यह विनती कीन्हीं॥
उतराई नहीं लूँगा राम। पतित पावन सीताराम॥३२॥


तुम आए हम घाट उतारे। हम आयेंगे घाट तुम्हारे॥
तब तुम पार लगाओ राम। पतित पावन सीताराम॥३३॥


भारद्वाज आश्रम पर आए। राम लखन ने शीष नवाए॥
एक रात कीन्हा विश्राम। पतित पावन सीताराम॥३४॥


भाई भरत अयोध्या आए। केकैई को यह वचन सुनाए॥
क्यों तुमने वन भेजे राम। पतित पावन सीताराम॥३५॥


चित्रकूट रघुनन्दन आए। वन को देख सिया सुख पाये॥
मिले भरत से भाई राम। पतित पावन सीताराम॥३६॥


अवधपुरी को चलिए भाई। ये सब केकैई की कुटिलाई॥
तनिक दोष नहीं मेरा राम। पतित पावन सीताराम॥३७॥


चरण पादुका तुम ले जाओ। पूजा कर दर्शन फल पाओ॥
भरत को कंठ लगाए राम। पतित पावन सीताराम॥ ३८॥


आगे चले राम रघुराया। निशाचरों का वंश मिटाया॥
ऋषियों के हुए पूरन काम। पतित पावन सीताराम॥ ३९॥


मुनिस्थान आए रघुराई। शूर्पणखा की नाक कटाई॥
खरदूषन को मारे राम।पतित पावन सीताराम॥ ४०॥


पंचवटी रघुनन्दन आए। कनक मृग 'मारीच' संग धाये॥
लक्ष्मण तुम्हे बुलाते राम। पतित पावन सीताराम॥ ४१॥


रावन साधु वेष में आया। भूख ने मुझको बहुत सताया॥
भिक्षा दो यह धर्म का काम। पतित पावन सीताराम॥ ४२॥


भिक्षा लेकर सीता आई। हाथ पकड़ रथ में बैठी॥
सूनी कुटिया देखी राम। पतित पावन सीताराम॥ ४३॥


धरनी गिरे राम रघुराई। सीता के बिन व्याकुलताई॥
हे प्रिय सीते, चीखे राम। पतित पावन सीता राम॥ ४४॥


लक्ष्मण, सीता छोड़ न आते। जनकदुलारी नहीं गवांते॥
तुमने सभी बिगाड़े काम। पतित पावन सीता राम॥ ४५॥


कोमल बदन सुहासिनी सीते। तुम बिन व्यर्थ रहेंगे जीते॥
लगे चाँदनी जैसे घाम। पतित पावन सीता राम॥ ४६॥


सुन री मैना, सुन रे तोता॥ मैं भी पंखों वाला होता॥
वन वन लेता ढूंढ तमाम। पतित पावन सीता राम॥ ४७॥


सुन रे गुलाब, चमेली जूही। चम्पा मुझे बता दे तू ही॥
सीता कहाँ पुकारे राम। पतित पावन सीताराम॥ ४८॥


हे नाग सुनो मेरे मन हारी। कहीं देखी हो जनक दुलारी॥
तेरी जैसी चोटी श्याम। पतित पावन सीताराम॥४९॥


श्यामा हिरनी तू ही बता दे। जनक-नंदिनी मुझे मिला दे॥
तेरे जैसी आँखें श्याम। पतित पावन सीताराम॥५०॥


हे अशोक मम शोक मिटा दे। चंद्रमुखी से मुझे मिला दे॥
होगा तेरा सच्चा नाम। पतित पावन सीताराम॥५१॥


वन वन ढूंढ रहे रघुराई। जनकदुलारी कहीं न पाई॥
गिद्धराज ने किया प्रणाम। पतित पावन सीताराम॥५२॥


चखचख कर फल शबरी लाई। प्रेम सहित पाये रघुराई॥
ऐसे मीठे नहीं हैं आम। पतित पावन सीताराम॥५३॥


विप्र रूप धरि हनुमत आए। चरण-कमल में शीश नवाए॥
कंधे पर बैठाये राम। पतित पावन सीताराम॥५४॥


सुग्रीव से करी मिताई। अपनी सारी कथा सुनाई॥
बाली पहुँचाया निज धाम। पतित पावन सीताराम॥५५॥


सिंहासन सुग्रीव बिठाया। मन में वह अति ही हर्षाया॥
वर्षा ऋतु आई हे राम। पतित पावन सीताराम॥५६॥


हे भाई लक्ष्मण तुम जाओ। वानरपति को यूँ समझाओ॥
सीता बिन व्याकुल हैं राम। पतित पावन सीताराम॥५७॥


देश-देश वानर भिजवाए। सागर के तट पर सब आए॥
सहते भूख, प्यास और घाम। पतित पावन सीताराम॥५८॥


सम्पाती ने पता बताया। सीता को रावण ले आया॥
सागर कूद गये हनुमान। पतित पावन सीताराम॥5९॥


कोने-कोने पता लगाया। भगत विभीषण का घर पाया॥
हनुमान ने किया प्रणाम। पतित पावन सीताराम॥६०॥


हनुमत अशोक वाटिका आए। वृक्ष तले सीता को पाए॥
आँसू बरसे आठों याम। पतित पावन सीताराम॥६१॥


रावण संग निशाचरी लाके। सीता को बोला समझा के॥
मेरी और तो देखो बाम। पतित पावन सीताराम॥६२॥


मंदोदरी बना दूँ दासी। सब सेवा में लंकावासी॥
करो भवन चलकर विश्राम। पतित पावन सीताराम॥६३॥


चाहे मस्तक कटे हमारा। मैं देखूं न बदन तुम्हारा॥
मेरे तन-मन-धन हैं राम। पतित पावन सीताराम॥६४॥


ऊपर से मुद्रिका गिराई। सीता जी ने कंठ लगाई॥
हनुमान ने किया प्रणाम। पतित पावन सीताराम॥६५॥


मुझको भेजा है रघुराया। सागर कूद यहाँ मैं आया॥
मैं हूँ राम-दास हनुमान॥ पतित पावन सीताराम॥६६॥


माता की आज्ञा मैं पाऊँ। भूख लगी मीठे फल खाऊँ॥
पीछे मैं लूँगा विश्राम। पतित पावन सीताराम॥६७॥


वृक्षों को मत हाथ लगाना। भूमि गिरे मधुर फल खाना॥
निशाचरों का है यह धाम। पतित पावन सीताराम॥६८॥


हनुमान ने वृक्ष उखाड़े। देख-देख माली ललकारे॥
मार-मार पहुंचाए धाम। पतित पावन सीताराम॥६९॥


अक्षय कुमार को स्वर्ग पहुँचाया। इन्द्रजीत फाँसी ले आया॥
ब्रह्मफांस से बंधे हनुमान। पतित पावन सीताराम॥ ७०॥


सीता को तुम लौटा दीजो। प्रभु से क्षमा याचना कीजो॥
तीन लोक के स्वामी राम। पतित पावन सीताराम॥ ७१॥


भगत विभीषन ने समझाया। रावण ने उसको धमकाया॥
सम्मुख देख रहे हनुमान। पतित पावन सीताराम॥ ७२॥


रुई, तेल, घृत, बसन मंगाई। पूँछ बाँध कर आग लगाई॥
पूँछ घुमाई है हनुमान। पतित पावन सीताराम॥ ७३॥


सब लंका में आग लगाई। सागर में जा पूँछ बुझाई॥
ह्रदय-कमल में राखे राम। पतित पावन सीताराम॥ ७४॥


सागर कूद लौटकर आए। समाचार रघुवर ने पाए।
जो माँगा सो दिया इनाम। पतित पावन सीताराम॥ ७५॥


वानर रीछ संग में लाए। लक्ष्मण सहित सिन्धु तट आए॥
लगे सुखाने सागर राम। पतित पावन सीताराम॥ ७६॥


सेतु कपि नल नील बनावें। राम राम लिख शिला तैरावें।
लंका पहुँचे राजा राम। पतित पावन सीताराम॥ ७७॥


निशाचरों की सेना आई। गरज तरज कर हुई लड़ाई॥
वानर बोले जय सियाराम पतित पावन सीताराम॥ ७८॥

इन्द्रजीत ने शक्ति चलाई। धरनी गिरे लखन मुरछाई।
चिंता करके रोये राम। पतित पावन सीताराम॥ ७९॥


जब मैं अवधपुरी से आया। हाय! पिता ने प्राण गंवाया॥
वन में गई चुराई वाम। पतित पावन सीताराम॥ ८०॥


भाई, तुमने भी छिटकाया। जीवन में कुछ सुख नहीं पाया॥
सेना में भारी कोहराम। पतित पावन सीताराम॥ ८१॥


जो संजीवनी बूटी को लाये। तो भी जीवित हो जाए॥
बूटी लायेगा हनुमान। पतित पावन सीताराम॥ ८२॥


जब बूटी का पता न पाया। पर्वत ही लेकर के आया॥
कालनेमि पहुँचाया धाम। पतित पावन सीताराम॥ ८३॥


भक्त भरत ने बाण चलाया। चोट लगी हनुमत लंग्दय॥
मुख से बोले जय सिया राम। पतित पावन सीताराम॥ ८४॥


बोले भरत बहुत पछता कर। पर्वत सहित बाण बिठा कर॥
तुम्हें मिला दूँ राजा राम । पतित पावन सीताराम॥ 85॥


बूटी लेकर हनुमत आया। लखन लाल उठ शीश नवाया।
हनुमत कंठ लगाये राम। पतित पावन सीता राम॥ ८६॥


कुम्भकरण उठ कर तब आया। एक बाण से उसे गिराया ॥
इन्द्रजीत पहुँचाया धाम। पतित पावन सीता राम ॥८७॥


दुर्गा पूजा रावण कीनो॥ नौ दिन तक आहार न लीनो॥
आसन बैठ किया है ध्यान। पतित पावन सीता राम॥८८॥


रावण का व्रत खंडित किना। परम धाम पहुँचा ही दीना॥
वानर बोले जयसिया राम। पतित पावन सीता राम॥ ८९॥


सीता ने हरि दर्शन किना। चिंता-शोक सभी ताज दीना॥
हंसकर बोले राजाराम। पतित पावन सीता राम॥ ९०॥


पहले अग्नि परीक्षा कराओ। पीछे निकट हमारे आओ॥
तुम हो पति व्रता हे बाम। पतित पावन सीता राम॥ ९१॥


करी परीक्षा कंठ लगाई। सब वानर-सेना हरषाई॥
राज विभीष्ण दीन्हा राम। पतित पावन सीता राम॥ ९२॥


फिर पुष्पक विमान मंगवाया। सीता सहित बैठ रघुराया॥
किष्किन्धा को लौटे राम। पतित पावन सीता राम॥ ९३॥

ऋषि पत्नी दर्शन को आई। दीन्ही उनको सुन्दर्तई॥
गंगा-तट पर आए राम। पतित पावन सीता राम॥ ९४॥


नंदीग्राम पवनसूत आए। भगत भरत को वचन सुनाये॥
लंका से आए हैं राम। पतित पावन सीता राम॥ ९५॥


कहो विप्र, तुम कहाँ से आए। ऐसे मीठे वचन सुनाये॥
मुझे मिला दो भैया राम। पतित पावन सीता राम॥९६॥


अवधपुरी रघुनन्दन आए। मन्दिर-मन्दिर मंगल छाये॥
माताओं को किया प्रणाम। पतित पावन सीता राम॥९७॥


भाई भरत को गले लगाया। सिंहासन बैठे रघुराया॥
जग ने कहा, हैं राजा राम। पतित पावन सीता राम॥९८॥


सब भूमि विप्रों को दीन्ही। विप्रों ने वापिस दे दीन्ही॥
हम तो भजन करेंगे राम। पतित पावन सीता राम॥९९॥


धोबी ने धोबन धमकाई। रामचंद्र ने यह सुन पाई॥
वन में सीता भेजी राम। पतित पावन सीता राम॥१००॥


बाल्मीकि आश्रम में आई। लव और कुश हुए दो भाई॥
धीर वीर ज्ञानी बलवान। पतित पावन सीता राम॥ १०१॥


अश्वमेघ यज्ञ कीन्हा राम। सीता बिनु सब सुने काम।।
लव-कुश वहां लियो पहचान। पतित पावन सीता राम॥ १०२॥


सीता राम बिना अकुलाईँ। भूमि से यह विनय सुनाईं॥
मुझको अब दीजो विश्राम। पतित पावन सीता राम॥ १०३॥


सीता भूमि माई समाई। सुनकर चिंता करी रघुराई॥
उदासीन बन गए हैं राम। पतित पावन सीता राम॥ १०४॥


राम-राज्य में सब सुख पावें। प्रेम-मग्न हो हरि गुन गावें॥
चोरी चाकरी का नहीं काम। पतित पावन सीता राम॥ १०५॥


ग्यारह हज़ार वर्षः पर्यन्त। राज किन्ही श्री लक्ष्मीकंता॥
फिर बैकुंठ पधारे राम। पतित पावन सीता राम॥ १०६॥


अवधपुरी बैकुंठ सीधी। नर-नारी सबने गति पाई॥
शरणागत प्रतिपालक राम। पतित पावन सीता राम॥ १०७॥


'हरि भक्त' ने लीला गाई। मेरी विनय सुनो रघुराई॥
भूलूँ नहीं तुम्हारा नाम। पतित पावन सीता राम॥ १०८॥


यह माला पुरी हुयी मनका एक सौ आठ॥
मनोकामना पूर्ण हो नित्य करे जो पाठ ॥


॥ हरि ॐ ॥

श्री रामचंद्र जी के संपूर्ण चरित्र को व्याखित करने वाले इन पदों को आप निम्नलिकित लिंक जो की चार भागो में हैं क्लिक कर सुन सकते हैं...


भाग : 1




भाग : 2




भाग : 3




भाग : 4







आइये सभी मिल सप्रेम श्री राम जी की स्तुति करते हैं....

                !! श्री राम स्तुति !!

श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं ।
नवकंज-लोचन कंज मुख, कर कंज, पद कंजारुणं ॥

कन्दर्प अगणित अमित छबि नवनील-नीरद सुन्दरं।
पटपीत मानहु तड़ित रूचि शुचि नौमि जनक सुतावरं॥

भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्यवंश-निकन्दनं।
रघुनन्द आनंद कंद कौशलचन्द दशरथ-नन्दनं॥

सिर मुकट कुण्डल तिलक चारू उदारु अंग विभूषणं।
आजानु-भुज-सर-चाप-धर, संग्राम जित-खरदूषणं॥

इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं।
मम ह्रदय कंज निवास कुरू, कामादि खलदल-गंजनं॥

मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।
करुणा निधान सुजान शील सनेह जानत रावरो॥

एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हिय हरषी अली।
तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मंदिर चली॥

                        !! दोहा !!

जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे॥


श्री रामचंद्र जी की यह दिव्य स्तुति आप सभी निम्नलिखित लिंक पर क्लिक कर सुन सकते हैं....







हमारे प्रिय श्री धाम वृंदावन के श्री राधा श्यामसुंदर जी, मर्यादा पुरषोतम श्री रामचंद्र और भगवती सीता जी के रूप में...

मर्यादा पुरषोतम श्री रामचंद्र एवं श्री भगवती सीता के श्री चरणों में बारम्बार प्रणाम हैं....

सिया राम तुम्हारे चरणों में, यदि प्यार किसी का हो जाये....

दो-चार ही की तो बात ही क्या, संसार उसी का हो जाये....
सिया राम तुम्हारे चरणों में......


सबरी ने कहाँ पर वेद पढ़े, अहिल्या कब यज्ञ रचाई थी....
जिसके मन छल और द्वेष नहीं, भगवान उसी का हो जाये....
सिया राम तुम्हारे चरणों में.....


रावण ने राम से बैर किया, अब तक पापी कहलाता हैं....
बन भक्त विभीषण शरण गया, घर बार उसी का हो जाये....
सिया राम तुम्हारे चरणों में.....


प्रहलाद तो छोटा बालक था, पर प्रेम किया परमेश्वर से...
जीना उसका सार्थक है जो, एक बार प्रभु का हो जाये...
सिया राम तुम्हारे चरणों में.....


दुनिया के दीवानों शिक्षा लो, उस प्रेम दीवानी मीरा से....
जो प्रेम करे सिया रघुवर से, बेड़ा पार उसी का हो जाये...
सिया राम तुम्हारे चरणों में.....


सिया राम तुम्हारे चरणों में, यदि प्यार किसी का हो जाये....
दो-चार ही की तो बात ही क्या, संसार उसी का हो जाये....
सिया राम तुम्हारे चरणों में......


!! जय श्री सीता राम जी !!

!! जय श्री हनुमान जी !!
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