!! ॐ !!


Wednesday, May 26, 2010

!! श्री श्री नरसिंह देव जी स्तुति !! : Shri Narsimha Dev Ji Stuti


!! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!

आज श्री नरसिंह जयंती है, आइये हम सब मिल भगवान श्री हरि नरसिंह नारायण की स्तुति उन्ही स्तोत्रो से करे...जिन स्त्रोतों से एक बार परम भक्त श्री प्रहलाद जी ने भगवान श्री हरि नरसिंह नारायण के रौद्र स्वरुप को शांत करने और उनके कृपा प्राप्त करने के लिए की थी…

श्री प्रहलाद जी, श्री हरि नरसिंह नारायण की गोद में बैठे हुए हैं,  और श्री हरि नरसिंह जी अपने हाथो से, श्री प्रहलाद जी के बालो को संवारते हैं... और अपनी जीभ से उनको चाटने लगते हैं.....जैसे कोई सिंह नी अपने शावको को प्रेम से वशीभूत हो चाटती हैं.....

और फिर श्री प्रहलाद जी हाथ जोड़ इस प्रकार श्री हरि नरसिंह देव जी की स्तुति करते है.....

Glory be to Lord Narsimha....Wondrous is your face, O Narsimha...

O Embodiment of righteous wrath...
O Awesome slayer of dreaded Hiranyakasyap...
I bow to thee, O supreme Lord Man-Lion...
Obesisance to thee O Narasimha....

नमो नमो नारायणा......नमो नमो नारायणा...
जय नरसिंह नारायणा.....अद्भुत छवि नारायणा.....
नमो नमो नारायणा......नमो नमो नारायणा...

Glory be to Lord Narayana...Glory be to Lord Narayana...
Glory be to Lord Narsimha....Wondrous is your face, O Narsimha...
Glory be to Lord Narayana...Glory be to Lord Narayana...


नरसिंह रूप हरे, प्रभु नरसिंह रूप हरे ....
शांत शांत जगदीश्वर, कृपा करो परमेश्वर....
चरण पडू मैं तुम्हरे, ॐ जय नरसिंह हरे.....
नरसिंह रूप हरे, प्रभु नरसिंह रूप हरे ....


Hail O Lord Narsimha, Hail O Lord in His ManLion Form..
Abate your wrath O Lord of the Universe, Be merciful O Absolute One...
I bow to you O Lord, We Seek Your protection.....
Hail O Lord Narsimha, Hail O Lord in His ManLion Form..


हे शरणागत वत्सल, भक्तन हितकारी....
तुम्हरा यश गावेंगे, युग युग नर नारी....
हे प्रहलाद के रक्षक, हे पालक यह बालक...
चरणन शीश धरे, ॐ जय नरसिंह हरे.....


For My Sake, O Lord Narsimha, You took uponYourself this task....
From being Narayana, The Supreme One You assumed this Man-Lion Form....
Most mighty is Your Power, O protector of devotees, How can we exist without you...
I bow to thee, O supreme Lord Narsimha, Hail O Lord in His Man-Lion Form..

नरसिंह रूप हरे... प्रभु नरसिंह रूप हरे ....
शांत शांत जगदीश्वर, कृपा करो परमेश्वर....

Hail O Lord Narsimha, Hail O Lord in His ManLion Form..
Abate your wrath O Lord of the Universe, Be merciful O Absolute One...

नमो नमो नारायणा......नमो नमो नारायणा...
जय नरसिंह नारायणा.....अद्भुत छवि नारायणा.....
नमो नमो नारायणा......नमो नमो नारायणा...

Glory be to Lord Narayana...Glory be to Lord Narayana...
Glory be to Lord Narsimha....Wondrous is your face, O Narsimha...
Glory be to Lord Narayana...Glory be to Lord Narayana...

Chant Lord Narsimha's Savred Name...

तत्पश्चात श्री प्रहलाद जी ने पुनः श्री हरि नरसिंह जी की स्तुति हरि अष्टकम नामक स्त्रोत से की जो इस प्रकार करते हैं ......

!! श्री हरि अष्टकम!!!

!! Shri Hari Ashtakam !!

हरिर्हरति पापानि दुष्टचितैरपि स्मृतः ।
अनिच्छयाऽपि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥


भगवान श्री हरि समस्त पापों को हर लेते हैं चाहे दुष्ट चित् ने ही उन्हें क्यों न याद किया हो, या न चाहते हुये भी उन्हें किसी ने याद किया हो.....बिलकुल वैसे ही जैसे अग्नि का स्पर्श करने से वह हर वस्तु को जला कर भस्म कर देती हैं.... वह, यह नहीं देखती कौन सी वस्तु पवित्र है और कौन से अपवित्र...


Bhagwan Shri Hari destroys the sins, even if remembered by cruel hearted...or him who remembered Bhagwan Shri Hari unwantingly, just like fire burns the fuel....


स गँगा स गया सेतुः स काशी स च पुष्करम् ।
जिह्वाग्रे वर्तते यस्या हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥


उस प्राणी ने श्री गंगा, सेतु, काशी और पुष्कर के दर्शन कर लिये जिसके मुँह मे भगवान श्री हरि का नाम के ये दो अक्षर निरंतर रहते हैं.....


He has been to the Sacred River Ganga, to Gaya and Kashi, as well as Pushakaram, on whose tongue reside these two alphabets: “HaRi”...


वाराणस्यां कुरुक्षेत्रे नैमिशारण्य एव च ।
यत्कृतं तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥


उस प्राणी ने वाराणसी, कुरुक्षेत्र, नैमिशारण में जो भी पुण्य कार्य हुये हैं वो सब कर लिये जो हरि नाम के ये दो अक्षरों का उच्चारण करता हैं ....


What ever good deeds have been done in Varanasi, Kurukshetra as well as Naimisharan...., they are all done by him who speaks the two alphabets : “HaRi”....


पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुन्यान्यायतनानि च ।
तानि सर्वाण्यशेषाणि हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥


पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं और अन्य भी जितने पुण्य और पवित्र स्थान हैं वो सब हरि, ये दो अक्षरों में हैं .....


All the holy places on this earth, and other auspicious places too, have been visited by him who takes the name of just two alphabets : “HaRi”....


गवां कोटिसहस्राणि हेमकन्यासहस्रकम् ।
दत्तं स्यात्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥


एक करोड़ गाऐं उसने दान कर दीं और एक हजार सोने की मूर्तीयाँ भी, जो हरि, ये दो अक्षरों का उच्चारण करता हैं.....


He has donated 10 million cows, and a thousand gold statues, ...who has uttered the word of just two alphabets : “HaRi”...


ॠग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदोऽप्यथर्वणः ।
अधीतस्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥


ॠग, साम, यजुर और अथर्व, ये चारों वेद उस ने पढ़ लिये हैं जो हरि, इन दो अक्षरों का ऊच्चारण करता है....


All the Vedas, Rig Yajur Saam and Atharva Veda, have been studied by him ....who utters Lord's name of just two alphabets : “HaRi”....


अश्वमेधैर्महायज्ञैः नरमेधैस्तथैव च ।
इष्टं स्यात्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥
अश्वमेध नाम के महायज्ञ से और नरमेध यज्ञ से जो पुण्य फल प्राप्त होते हैं वो सब भगवान हरि का नाम लेने वाले को प्राप्त होते हैं....


He attains the desirable fruits of the great Yajya Ashvamedha and also of the yajya Narmedha .... who utters Lord's name of just two alphabets : “HaRi”...


प्राण प्रयाण पाथेयं संसार व्याधिनाशनम् ।
दुःखात्यन्त परित्राणं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥


हरि नाम के ये दो अक्षर कानों द्वारा प्राणों के रस्ते जाकर संसार रूपी बीमारी का नाश कर देते हैं और अत्यन्त दुख का अन्त करते हैं....


On entering the path of the ears, these name of the Lord Hari, destroyes the disease of this world, destroys even the grievious misery, the Lord's name of just two alphabets : “HaRi”...


बद्ध परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ।
सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥


जो हरि का नाम लेते हैं वे पुण्यशील लोग हाथ जोड़े मोक्ष कि तरफ बढते हैं....


With Hands Folded, walking toward Liberation (Mukti) are those, good doers, who utter the Lord's name of just two alphabets : “HaRi”...

!! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!

जो कोई भी प्राणी सच्चे हृदय से श्री प्रहलाद जी द्वारा रचित यह हरिअश्तकम का स्त्रोत्र सुनता अथवा कहता हैं.... उसके पापों का जल्दी ही क्षय हो जाता है......दिन और रात मे किये पाप से, श्री नरसिंह जी की स्तुति सुनने या पढने से, मनुष्य मुक्त हो जाता है, इस में कोई शक नहीं है .....

जैसे भगवान हरि जी ने प्रहलाद जी की सभी संकटों से रक्षा की थी, उसी प्रकार वे उसकी भी रक्षा करते हैं जो उनके श्री स्तुति हृदय से सदा सुनता और कहता हैं




Param Bhakt Shri Prahlad Ji did stuti of Shri Narsingh Dev ji with this Holy “Shri Hari Astakam” Strotra..... This Auspicious Paryer, Who ever studies after getting up in the morning, He attains long age, strength, well being, fame and prosperity...... Created and Spoken by Shri Prahlad Ji, this text dries up the ocean of misery of him who reads it, and he reaches that supreme state called shri Hari Vishnu Narayana.....




!! ॐ नमः भगवते वासुदेवाय !!
!! जय जय श्री नरसिंह देव जी !!
!! जय जय श्री भक्त शिरोमणि प्रहलाद जी !!

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