!! ॐ !!


Saturday, September 4, 2010

!! श्री नरसिंह जी एवं श्री प्रहलाद जी चरित्र !! : Shri Narsimha Ji's and Shri Prahalad Ji's Charitra



!! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!


हमारे परम पवित्र सनातन धर्म में भक्त और भगवान् का "प्रेम और करुणा" का  अटूट  संबंध   और उनकी पवित्र कथाओ का वर्णन सदा से ही हमे अतिदुर्लभ  और मूल्यवान, जो  हमे  केवल   उस परमात्मा की दया दृष्टि से ही प्राप्त होने वाली उनकी श्री चरणों की "भक्ति" और "अनुराग" के मार्ग को प्रशस्त कर नित्य प्रति हमें मार्गदर्शन करती है...और हमारे अंतर्मन में निहित प्रभु के प्रति भक्ति-भाव में उत्साहवर्धन करती है...


आइये, आज श्री हरि विष्णु की प्रिय "अजा एकादशी" के शुभ उपलक्ष्य में ऐसी ही एक श्री हरि विष्णु के परम प्रिय भक्त श्री प्रहलाद जी एवं श्री हरि विष्णु के नरसिंह अवतार की कथा का रसास्वादन करते है...


ऐसा शास्त्रों में कहा गया है की:  "कोई भी प्राणी सच्चे हृदय से श्री नरसिंह जी और श्री प्रहलाद जी के चरित्र और उनकी कथा को सुनता अथवा कहता हैं.... उसके पापों का जल्दी ही क्षय हो जाता है... दिन और रात मे किये पाप से, श्री नरसिंह जी और प्रहलाद जी का चरित्र सुनने या पढने से, मनुष्य मुक्त हो जाता है, इस में कोई शक नहीं है..."



श्री विष्णुपुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार दैत्यों के आदि पुरुष श्री कश्यप जी और उनकी पत्नी दिति के दो राक्षस पुत्र हुए... हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष... वे दोनों बहुत ही क्रूर स्वाभाव के थे और सदा से ही भगवान श्री हरि विष्णु से द्वेष भाव रखते थे...


एक अन्य कथा के अनुसार, जब हिरण्याक्ष ने श्री भगवती पृथ्वी देवी को समुद्र के रसातल में ले गया था... क्योकि वह देवताओ और श्री हरि विष्णु से द्वेष करता था, उसका मानना था की पृथ्वी पर रहने वाले लोगों के पूजा, अर्चना और यज्ञ आदि कर्मो से देवताओ की बल मिलता हैं...

श्री वराह अवतार...

अपने भक्तों की करुण पुकार सुन भक्त वत्सल भगवन श्री हरि विष्णु ने स्वयं वराह के रूप में अवतार लेकर भगवती पृथ्वी के उद्धार हेतु राक्षस हिरण्याक्ष से समद्र के रसातल में युद्ध किया और अंततः हिरण्याक्ष का संहार कर भगवती पृथ्वी देवी को अपने नथुने के दांतों से रसातल से बाहर निकाला था....


जब हिरण्याक्ष के भाई हिरण्यकश्यप को अपने भाई की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ तो वो बहुत ही क्रोधित हुआ और मन ही मन भगवन श्री हरि विष्णु से और ज्यादा द्वेष करने लगा..... और मन ही मन उनसे बदला लेने की सोची...ऐसा सोच हिरण्यकश्यप ने एक दिन अपने मंत्रियों की एक सभा का आयोजन किया...

हिरण्यकश्यप द्वारा अपने सभासदो को क्रोधित हो संबोधित करना...


उस सभा में सभी दैत्य मंत्री और राक्षस भी आये थे, उन्हें संबोधित कर हिरण्यकश्यप अत्यंत ही क्रोधित होकर इसप्रकार कहने लगा :
“आज हम अपने छोटे भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु का शोक मनाने के लिए यहाँ एकत्रित हुए हैं... इन्द्र जैसे हमारे क्षुद्र शत्रुओ ने दैत्य शिरोमणि हिरण्याक्ष को विष्णु के हाथो मरवा डाला हैं... जिसका बदला न केवल विष्णु से बल्कि समस्त देवताओ से लेना होगा, ये विष्णु पहले तो बड़ा शुद्द और निष्पक्ष था.... परन्तु देवताओ के बहकाने से यह भी मायावी हो गया हैं.... और अपनी माया से वराह आदि रूप धारण करने लग गया हैं... आज मैं सबके सामने ये प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं अपने इस त्रिशूल से विष्णु का वध करूँगा... और अपने भाई की मृतात्मा को तृप्त करूँगा, जिस प्रकार जड़ के कट जाने से पेड़ो के पत्ते सुख कर गिर जाते हैं, ठीक उसी प्रकार विष्णु के न रहने से समस्त देवताओ की शक्ति क्षीण हो जायेगी..."


ऐसा प्रतिज्ञा कर हिरण्यकश्यप ने सभा विसर्जित की, और उस प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए उपाय सोचने लगा... वो यह जानता था की भगवान् श्री हरि विष्णु से युद्ध में जितना आसान नहीं है... ऐसा सोच वो वन में तपस्या करने के लिए गया...और वह जाकर उसने भगवान् श्री ब्रम्हा जी की तपस्या की...

हिरण्यकश्यप, अमरता के वरदान की लालसा में तपस्या करते हुए...


काफी वर्ष तपस्या में बीत जाने के बाद, जब उसका शरीर अत्यंत ही क्षीण हो गया, एक दिन स्वयं ब्रह्मा जी उसे वरदान देने के लिए उपस्थित हुए...


हिरण्यकश्यप ने उनसे अमरता का वरदान माँगा, परन्तु सृष्टि की मर्यादा के अनुकूल न होने पर ब्रह्मा जी ने उसे कोई और वरदान मांगने को कहा...तो हिरण्यकश्यप ने उनसे वरदान मांगते हुए कहा :
"हे! ब्रह्मा जी मुझे ऐसा वरदान दीजिए जिससे मैं किसी व्यक्ति से मरू न किसी पशु से.... न मैं किसी अस्त्र से मरू न शास्त्र से.... न मैं दिन में मरू न रात्रि में.... न मैं धरती में मरू न आकाश में..... न में घर के अंदर मरू न बाहर मरू..... न ही मैं इन बारह महीनो में किसी भी एक महीनो में मरू...."



श्री ब्रह्मा जी, हिरण्यकश्यप की तपस्या से प्रसन्न हो उसे वरदान देने के लिए प्रकट होते हैं...

ऐसा सुन ब्रह्मा जी ने हिरण्यकश्यप को वो वरदान दे दिया, और वह से चले गए...


इस वरदान को पा हिरण्यकश्यप सोचने लगा कि... अब उसे इन परिस्थितियों में कोई नहीं मार सकता, इस प्रकार उस वरदान ने हिरण्य कश्यप को अहंकारी बना दिया और वह अपने आप को अमर समझने लगा... उसने स्वर्ग के रजा इंद्र का राज्य छीन लिया और तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा... वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें... उसने अपने राज्य में श्री हरि विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया उसने संपूर्ण ब्रह्माण्ड में अपना आधिपत्य बना लिया... और जो कोई भी श्री हरि विष्णु की पूजा अर्चना या उनका नाम लेता वो उसे मृत्युदंड दे देता था...

हिरण्यकश्यप द्वारा, समस्त लोको को जीतने के बाद स्वर्ग में इन्द्र से जीतने हेतु चढाई करना...

उस हिरण्यकश्यप की पत्नी कयाधु एक धर्मपरायण स्त्री थी, जब वो गर्भवती थी तो उसकी धरम परायणता को देख स्वयं नारद जी ने उसे श्री हरि विष्णु की कथा का उपदेश दिया था....जिसके फलस्वरूप उसका गर्भ में स्थित शिशु जो कि प्रहलाद थे, उनको गर्भकाल से ही भगवन श्री हरि विष्णु के नाम के प्रति अनुराग हो गया...


श्री प्रहलाद जी


देवताओ सहित तीनों लोको के प्राणी उस दैत्य हिरण्यकश्यप के सामने नतमस्तक हो गए... उस समय सारी सृष्टि में केवल एक नन्हा सा बालक ही ऐसा था जो भगवान् श्री हरि विष्णु के नाम का निरंतर कीर्तन करता रहता था... और वो उसी हिरण्य कश्यप का पुत्र प्रहलाद था... श्री प्रहलाद जी ५ वर्ष कि अवस्था में ही ब्रम्हलीन हो श्री हरि का नाम जपते रहते थे....


हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद जी को श्री हरि के प्रति भक्ति भाव देख उन्हें बहुत ही तरीके से समझया, डराया और प्रताड़ित किया... परन्तु श्री प्रहलाद जी श्री हरि की परम भक्ति से विमुख न हुए... हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद को राक्षसी गुरुकुल भेजा... ताकि उनको श्री हरि विष्णु की भक्ति से विमुख हो सके...

श्री प्रहलाद जी अपने गुरुकुल के मित्रो को श्री हरि नाम का उपदेश और उसका महत्व बताते हैं...


श्री प्रहलाद जी को गुरुकुल भेज हिरण्यकश्यप मदिरा पान में तन्मय हो सम्पूर्ण सृष्टि को अपनी क्रूरता से प्रताड़ित करने लगा, नर नारी, नाग, किन्नर, गंधर्व और स्वयं इन्द्र आदि देवतागण भी उससे भयभीत रहने लगे...


इधर भक्त प्रहलाद जी गुरुकुल में श्री हरि का नाम निरंतर जपते रहे... अपने राक्षस सखाओ को भी श्री हरि विष्णु के नाम संकीर्तन महत्व समझाया और जिससे प्रभावित हो उनके सभी सखा और गुरुजनों को भी श्री हरि विष्णु के श्री चरणों में अनुराग हो गया...

श्री प्रहलाद जी, अपने गुरुकुल के मित्रो के साथ हरि नाम संकीर्तन करते हुए....


श्रीमन नारायण नारायण हरि हरि...
श्रीमन नारायण नारायण हरि हरि...


तेरी लीला सबसे न्यारी न्यारी.....हरि हरि...
तेरी महिमा प्रभु है प्यारी प्यारी...हरि हरि


श्रीमन नारायण नारायण हरि हरि.....
श्रीमन नारायण नारायण हरि हरि.....


कुछ समय के पश्चात हिरण्यकश्यप ने सोचा की अब तो प्रहलाद विष्णु को भूल गया होगा सो उसने प्रहलाद को गुरुकुल से बुलवा लिया....


एक दिन जब हिरण्यकश्यप मदिरापान में लगा हुआ था, तो उस के सामने उसका वह धर्मात्मा पुत्र प्रहलाद जी आये... और श्री प्रहलाद जी विन्रमता पूर्वक अपने पिता को प्रणाम किया...


अपने उस तेजस्वी पुत्र को प्रणाम करते देख हिरण्य कश्यप बोला: 
 “हे वत्स !! अब तक तूने जो कुछ भी पढा है, उसे तु मुझे सार रूप से बता..."







श्री प्रहलाद जी बोले:
“सुनिये पिताश्री !! आप की आज्ञा से मैं वह सार बताता हूं जो मेरे मन में समाया हुआ है.....'जिसका कोई आदि नहीं है, मध्य नहीं है, अन्त नहीं है, जो वृद्धि और क्षय से परे है....उन अच्युत भगवान श्री हरी विष्णु को मैं प्रणाम करता हूं जो अन्तः करण में स्थित हैं और सभी कारणों के कारण हैं..."



यह सुन कर वह दैत्य हिरण्यकश्यप क्रोध से लाल हुई आँखों से श्री प्रहलाद जी को देखते हुए, काँपते होंठों से बोला:
“ऐ दुर्मति बालक !! इस प्रकार की अनुचित बातें तुमने कहां से सीखी.... “






श्री प्रहलाद जी बोलेः
”हे पिताश्री !! वह श्री हरि विष्णु तो सबके हृदय में स्थित हो कर सभी को सिखाते हैं.... उन परमात्मा के अतिरिक्त और भला कौन किसे कुछ सिखा ही सकता है...”





हिरण्यकश्यप बोला:
“कौन है यह विष्णु ? जिसकी तू महा दुर्बिद्धि बार बार बात किये जा रहा है..... इस जगत का ईश्वर तो मैं हूं....जिसके सामने तू यह सब कह रहा है....मैं स्वयं इस जगत का भगवान हूँ.....मेरे चलने से पृथ्वी थर-थर कांपने लग जाती हैं.... नाग, यक्ष, गंधर्व, देवता आदि सभी मेरे नाम की माला जपते हैं.... तीनों लोको में सभी प्राणी केवल मेरी पूजा करते हैं...परन्तु केवल तू ही एक ऐसा है....जिसने मेरी पूजा करना अस्वीकार किया हैं...क्या यह सत्य हैं ???


श्री प्रहलाद जी ने कहा : 
“ हाँ पिता श्री, यह सत्य हैं...”







हिरण्यकश्यप बोले :
‘"क्यों ?”







श्री प्रहलाद जी ने कहा:
“क्योकि....संसारी प्राणी आपकी भक्ति के कारण नहीं, बल्कि आपके भय के कारण आपकी पूजा करके आपके अहंकार को बढ़ा रहे हैं... आपको कुमार्ग पर चला रहे हैं... परन्तु मैं आपका पुत्र होकर आपको इस कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग पर लाना अपना कर्त्तव्य समझता हूँ... इसलिए मैं आपकी पूजा नहीं करता...”


यह सुन हिरण्यकश्यप अत्यंत क्रोधित हुआ और इस प्रकार कहने लगा:
“तो किसकी पूजा करना चाहता है तू...?”






श्री प्रहलाद जी ने शांत हृदय से कहा :
 ”पिता श्री !! तीनों लोको में तो पूजा के योग्य केवल एक ही हैं....अच्युत, अविनाशी, परमेश्वर श्री हरि विष्णु भगवान...मैं उन्ही की पूजा करता हूँ और करना चाहता भी हूँ..”




यह सुन हिरण्यकश्यप की क्रोध की कोई सीमा न रही और उसकी आँखे लाल हो गयी और भृकुटी तन गयी....और वह इस प्रकार कहने लगा :
 “मुर्ख पुत्र !! तू उस विष्णु की बात कर रहा हैं... जो मेरे भय से ब्रह्माण्ड का त्याग करके भाग गया... जो मेरी क्रोध अग्नि पल भर के लिए भी सहन नहीं कर सकता....सुन प्रहलाद !! विष्णु मेरा प्रबल शत्रु हैं... वो मेरे भाई का हत्यारा हैं... और तेरा भी यही कर्त्तव्य हैं, कि असुर कुल के प्रबल शत्रु विष्णु से तू भी द्वेष रखे...”


यह सुन श्री प्रहलाद जी ने कहा :
“नहीं पिताश्री.!! भगवान श्री हरि विष्णु तो किसी के शत्रु नहीं....वो तो सबके पालनकर्ता हैं..."






हिरण्यकश्यप क्रोधित हो बोला :
 "तू झूठ बोलता हैं....वो अवश्य मेरा शत्रु है....वो मेरा नाश करना चाहता हैं...”






श्री प्रहलाद जी ने कहा :
“हे पिताश्री !! ये आपका भ्रम हैं....जिस प्रकार श्री हरि विष्णु के लिए विश्व के समस्त प्राणी उनके बालक के सामान हैं....उसी प्रकार आप भी उनके बालक हैं...वो आपका नाश कभी नहीं करना चाहते....केवल आपके कुकर्मो का...आपके अधर्म का नाश करेंगे...”



यह सुन तो हिरण्य कश्यप क्रोध से तिलमिला उठा और तत्क्षण श्री प्रहलाद जी को क्रोध से पकड़ इस प्रकार कहने लगा :
“ मूढ़ !! मुझे कुकर्मी कहता हैं...मुझे अधर्मी कहता है....अरे मुर्ख !! विष्णु मेरा नाश करे या न करे.....मैं तेरा नाश अवश्य करूँगा....”





श्री प्रहलाद जी ने निडर हो कहा :
“यही आपकी भूल है पिता श्री!! भगवान की इच्छा के बिना कोई किसी का नाश नहीं कर सकता... जब तक उन श्री हरि की इच्छा नहीं होगी, तब तक मेरा नाश कोई नहीं कर सकता... हाँ अगर प्रभु कि इच्छा हो जायेगी तो आपके कुछ किये बिना ही मेरा नाश हो जायेगा...”


यह सुन हिरण्यकश्यप ने अत्यंत क्रोधित हो इस प्रकार कहा :
“तेरा नाश अवश्य होगा...क्योकि यह अब मेरी इच्छा है...और मैं यहाँ का भगवान हूँ....”





यह सुन प्रहलाद जी ने अत्यंत विनम्रता से कहा :
“पिताश्री !! बस यही अहंकार आपको सत्य नहीं देखने देता....जिस दिन आप अपने अहंकार और अपने अभिमान का त्याग करके सच्चे हृदय से श्री हरि विष्णु कि शरण में जायेंगे.. .तभी आपको पता चलेगा, कि वही सर्व शक्तिमान हैं....उनकी इच्छा बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता....मेरी प्रार्थना मानिये....अब भी समय हैं....भगवान विष्णु की शरण में जाकर उनके श्री चरणों में शीश नवा दीजिए...वे परम दयालु हैं...वे तुरंत ही आपके समस्त अपराध क्षमा कर देंगे....और आपको पापहीन कर देंगे....”


ऐसा सुन हिरण्यकश्यप ने अपने दैत्य सैनिको को तत्क्षण बुलाया और इसप्रकार कहा :
 “ले जाओ इसे और इसकी जीभ काट दो....यह मुझे पापहीन करना चाहता था....प्राणहीन कर दो इसे.....शारीर के जिस अंग पर घाव हो जाता है, और वो घाव सड़ने लगता है तो उसे काट कर फेंक देने में ही भलाई होती हैं...ठीक उसी प्रकार इस दुर्मति को भी में अपने जीवन से निकल फेंकूंगा.....जाओ ले जाओ इसे..और इसे भिन्न प्रकार के शस्त्रों से काट कर मार डालो"


दैत्य सैनिक श्री प्रहलाद जी को शास्त्रों से इस प्रकार प्रहार करते हैं...


हिरण्यकश्यप की आज्ञा पा, वे दैत्य सैनिक श्री प्रहलाद जी को एक स्थान पर बिठा उन पर शस्त्रों का प्रहार करने लगे, परन्तु उन शस्त्रों का उन पर कोई प्रभाव न पड़ा... क्योकि वे निरंतर श्री हरि विष्णु का ध्यान लगा कर बैठे थे...  और श्री विष्णु उनकी रक्षा स्वयं कर रहे थे...


जब हिरण्यकश्यप ने सुना की प्रहलाद को शस्त्रों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो वो आश्चर्य चकित हो दैत्य सैनिको से कहा :
 "ले जाओ इसे और पर्वत की ऊँची चोटियों से नीचे फेंक दो इसे...जाओ ले जाओ इस कुल कलंक को...”





ऐसा सुन उन दैत्य सैनिको ने श्री प्रहलाद जी को पर्वत की ऊँची चोटी पे ले गए और उन्हें नीचे फेंकने लगे और उसी समय प्रहलाद जी ने श्री हरि विष्णु का ध्यान किया... दैत्य सैनिको ने उनको ऊपर से नीचे फेंक दिया, परन्तु अपने प्रिय भक्त की पुकार सुन श्री हरि विष्णु स्वयं पर्वत के नीचे उपस्थित हो अपने प्रिय भक्त को अपने गोद में थाम लिया...

दैत्य सैनिक श्री प्रहलाद जी को पर्वत की चोटी से नीचे फेंकते हुए और श्री हरि उन्हें अपने हाथो में थामते हुए...


और जब प्रहलाद जी का पुनः की जीवित होने का समाचार हिरण्यकश्यप को लगा तो वो पुनः उन्हें मारने का अन्य उपाय सोचने लगा... और उसने अपने दैत्य सैनिको को कहा :
"ले जाओ इसे... और एक पागल हाथी के पैरो के नीचे दबा के मार डालो..."






दैत्य सैनिक श्री प्रहलाद जी को एक हाथी के पाँव तले कुचलते हुए...


अपने राजा की आज्ञा पा सैनिक फिर से श्री प्रहलाद जी को एक हाथी के पैरो के नीचे डाल दिया... श्री प्रहलाद जी पुनः भगवन श्री हरि विष्णु का ध्यान करने लगे... जिसके फलस्वरूप भगवन श्री हरि विष्णु ने स्वयं प्रहलाद जी को उस हाथी के सिर पे ला बिठा दिया...



श्री भगवान द्वारा, श्री प्रहलाद जी की हाथी से रक्षा कर उन्हें हाथी के सिर पर बिठाना....


 श्री भगवान के द्वारा बचा लिए जाने पर आश्चर्य चकित दैत्य सैनिको के समक्ष श्री प्रहलाद जी इस प्रकार से प्रभु श्री हरि विष्णु का गुणगान करने लगते है...


मारने वाला है भगवान् , बचाने वाला है भगवान् !
बाल न बांका होता उसका जिसका रक्षक दयानिधान !!


त्याग दो दे रे भाई कल की आशा, स्वार्थ बिना प्रीत जोड़ो !
कल क्या होगा इसकी चिंता, जगतपिता पर छोड़ो !!


क्या होनी है क्या अनहोनी, सबका उसको ज्ञान !
मारने वाला है भगवान् , बचाने वाला है भगवान् !


मारने वाला है भगवान् , बचाने वाला है भगवान् !
बाल न बांका होता उसका जिसका रक्षक दयानिधान !!


इस बार फिर जब हिरण्यकश्यप को पता चला की श्री प्रहलाद जी को कुछ नहीं हुआ और वे जीवित हैं तो उसने स्वयं बहुत सारे विषधर नागों को एक कुण्ड में एकत्रित किया और उसके बीच श्री प्रहलाद जी को बिठा दिया....जिससे की वे नाग उनको डस ले और उनकी ईहलीला समाप्त हो जाये....

नागो के कुण्ड में बैठे श्री प्रहलाद जी, भगवान श्री हरि का ध्यान करते हुए...


उस कुण्ड में बैठ श्री प्रहलाद जी पुनः श्री हरि विष्णु का ध्यान करने लगे... और एक बार पुनः एक भक्त की भक्ति की विजय होती हैं... उन नागो ने श्री प्रहलाद जी को कुछ न किया अपितु उन्हें प्रणाम कर वहाँ से चले गए...


जब हिरण्यकश्यप को पुनः यह पता चला की भक्त प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं हुआ तो उसने कहा :
 "तुम भी उस विष्णु की माया से बार बार बच रहे हो... लेकिन अब तुम्हे मैं गरम गरम तेल की कढ़ाई में डालकर तुम्हारे इस शरीर को खोलाऊंगा...और इस बार में स्वयं वहाँ उपस्थित रहूँगा..."



श्री प्रहलाद जी को गरम गरम खौलते हुए तेल की कढ़ाई में डालना...


ऐसा कह हिरण्यकश्यप ने गरम गरम तेल की कढ़ाई का प्रबंध किया और उसके नीचे चूल्हे में आग जला दी और प्रहलाद जी से कहा की उसमे प्रवेश करे... श्री प्रहलाद जी ने श्री हरी विष्णु का मन ही मन “ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय“ मंत्र के द्वारा स्मरण किया और उस गरम गरम तेल के कढ़ाई में प्रवेश किया...और देखते ही देखते वो खौलते हुए तेल की कढ़ाई फूलो से भर गयी.....


इस प्रकार बार बार प्रहलाद को मारने में असफल हिरण्यकश्यप अत्यंत चिंतित हो गया... उस समय हिरण्यकश्यप की एक बहन होलिका वही पर उपस्थित थी... अपने भाई को चिंताग्रस्त देख उसने कहा :
“ भैया आप चिंता न करे !! प्रहलाद को मैं क्षण में ही मृत्यु को प्राप्त करवा दूंगी...”






हिरण्य कश्यप न कहा :
“ बहन कैसे...”






होलिका न कहा :
 ”भैया !! मेरे पास एक वरदान स्वरुप एक चादर है.....जिसे ओढ़ कर में अग्नि में प्रवेश करू तो वो मुझे नहीं जला सकती.... मैं प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठ जाउंगी....जिससे मैं तो बच जाउंगी, परन्तु प्रहलाद अग्नि में भष्म हो जायेगा...”



ऐसा सुन हिरण्यकश्यप प्रसन्न हुआ और तत्क्षण ही अग्नि का प्रबंध करने का आदेश अपने दैत्य सैनको को दिया......

होलिका द्वारा, श्री प्रहलाद जी को स्वयं के साथ अग्नि में प्रवेश करना...


निश्चित समय में होलिका ने भक्त शिरोमणि श्री प्रहलाद जी को अपनी गोद में बिठा अग्नि में प्रवेश करने लगी... और श्री प्रहलाद जी पुनः भगवान श्री हरी विष्णु का ध्यान करने लगे... फिर श्री हरि विष्णु की कृपा से वो अग्नि उनके प्रिय भक्त प्रहलाद के लिए तो शीतल हो गयी... परन्तु दूसरों का अहित चाहने वाली वह होलिका अग्नि में भस्म हो गयी... उसकी वरदान स्वरुप चादर जो उसको अपनी स्वयं की रक्षा के लिए भगवान ने उसे दी थी... उसने उस चादर का दुरुपयोग किसी दूसरे प्राणी का अहित करने के लिए किया... इसलिए वो चादर भी उसको बचा न सकी...


और फिर श्री प्रहलाद जी महाराज उस स्थान पर एकत्रित हुए समस्त जनमानस को संबोधित करते हुए इस प्रकार श्री हरि नाम का संकिरात्न करने लगे....


मैं कहता डंके की चोट पर, ध्यान से सुनियो लाला...
अपना हरि है हज़ार हाथ वाला. ओ दीनदयाला...
ओ दीनदयाला... अपना हरि है, हज़ार हाथ वाला...


कोई झुका नहीं सकता जग में, अपने प्रभु का झंडा...अपने प्रभु का झंडा...
जो उसको छेरेगा... उसके सर पे परेगा डंडा... उसके सर पे परेगा डंडा...
युगों युगों से इस धरती पर... उसी का है बोल बाला...
अपना हरि है, हज़ार हाथ वाला....
ओ दीनदयाला... अपना हरि है, हज़ार हाथ वाला....


मैं कहता डंके की चोट पर, ध्यान से सुनियो लाला...
अपना हरि है हज़ार हाथ वाला. ओ दीनदयाला....
अपना हरि है, हज़ार हाथ वाला....
ओ दीनदयाला....अपना हरि है, हज़ार हाथ वाला....


!! जय जय नारायण नारायण हरि हरि !!


जब हिरण्यकश्यप को अपनी बहन की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ तो वो स्वयं प्रहलाद के पास पहुंचा और वो श्री प्रहलाद जी को अपनी हाथो से पकड़ अपनी मंत्रियों की सभा के बीच ले आया... और अपने दैत्य सैनिको को एक खम्बे की ओर इशारा करते हुए इसप्रकार आज्ञा दिया :
 "सैनिको... जाओ तुरंत ही इस खम्बे को सूर्य की ज्वाला सी गरम करने का प्रबंध करो...आज मैं इस मूढ़ बालक को उस गरम गरम खम्बे का आलिंगन करवा निश्चय ही यमपुरी पहुंचाऊंगा”




यह सुन समस्त सैनिक उस खम्बे को गरम करने के लिए उस खम्बे पर तेल आदि पदार्थ को डाल उसमे आग लगा दी...


और फिर हिरण्यकश्यप श्री प्रहलाद जी की ओर मुख करके इस प्रकार कहने लगा :
“मुर्ख, तू बहुत उद्दंड हो गया हैं... तुने मेरी परम शक्ति को चुनौती दी हैं... मैं अभी तुम्हे यमपुरी पहुंचाता हूँ... अब मैं तेरा काल बनकर तुझे धुल में मिलाता हूँ... तू किसके बल बूते पर इतना घमंड कर रहा हैं...?”




श्री प्रहलाद जी ने आकाश की ओर उंगली का इशारा करते हुए कहा :
“उसके बलबूते पर !! जो सबका बल हैं, पिताश्री... आपको भी वही बल देता हैं.... न केवल आप और मैं, बल्कि संसार के समस्त बलवानो का बल भी केवल वही है... हे पिताश्री !! भगवान श्री हरी बहुत ही दयालु हैं... इसलिए अब भी समय हैं, कि आप अपना अहंकार त्याग कर उनकी शरण में चले जाये... वे अवश्य आपके अपराध क्षमा कर देंगे... आप क्रोध का त्याग करे पिताश्री...”


यह सुन हिरण्यकश्यप अत्यंत ही क्रोधित हो श्री प्रहलाद जी से कहने लगा:
“इतनी छोटी सी आयु में इतनी लंबी जीभ... अरे अभी तक तो तू मेरे खडाऊ जितना ऊचा भी नहीं हुआ... और मुझे ही शिक्षा देने लगा“





श्री प्रहलाद ने विनार्मता पूर्वक पुनः कहा :
“पिताश्री !! आप पुनः भूल कर रहे हैं, आप जिसे मेरी छोटी सी आयु कहते हैं... वो मेरी नहीं हैं... मेरे इस शरीर की आयु हैं... पिताश्री मैं इस शरीर के अंदर आत्मा रूप में वास करता हूँ... उसकी आयु तो अनंत वर्षों की हैं, वो नित्य हैं... और फिर जिसे मैंने आत्मा कहा हैं... वो भी अंतिम सत्य नही हैं... आत्मा तो परमात्मा का प्रतिबिम्ब मात्र ही हैं... उस दृष्टि से हर शरीर में परमात्मा का ही वास हैं... वे मेरे शरीर में हैं... और वे आपके शरीर में भी हैं... वे संसार के समस्त कण कण में हैं... जिसे आत्मज्ञान हो जाता है उसे शरीर नहीं दिखता, केवल परमात्मा ही दिखते हैं...”


यह सुन हिरण्यकश्यप की आँखे क्रोध से लाल लाल हो गयी और उसकी भृकुटी तन गयी और श्री प्रहलाद जी से इस प्रकार कहा :
“अरे मुर्ख !! और कहाँ-कहाँ दिखता है तुझे तेरा परमात्मा...”






श्री प्रहलाद जी ने कहा:
“प्रत्येक वस्तु में आकाश में, धरती में, वायु में, आप में, मुझे में, सारे संतो में, और इन दैत्य सैनिको में भी.... आप विश्वास कीजिये पिताश्री... वे सृष्टीके कण-कण में विद्यमान हैं...“




हिरण्यकश्यप ने कहा :
“ यहाँ के हर वस्तु में भी”






प्रहलाद जी ने हाथ जोड़ कर कहा :
 “ जी पिताश्री “







हिरण्यकश्यप ने पुनः कहा :
“ इस महल में भी ?“






प्रहलाद जी ने कहा :
“जी पिताश्री!! मैं तो उन्हें इस महल की हर वस्तु में देख रहा हूँ...”






हिरण्यकश्यप ने पुनः कहा:
“तो इस अग्नि से दहकते हुए खम्बे में भी दिखता है...तुझे तेरा परमात्मा...?






प्रहलाद जी ने कहा :
"जी पिताश्री ...वे उस खम्बे में भी हैं...”







हिरण्यकश्यप ने पुनः कहा :
“अरे मूढ़ !! यदि वो इस अग्नि से दहकते हुए खम्बे में भी अगर तेरा वो विष्णु है तो जा आलिंगन कर उसका...”





यह सुन श्री प्रहलाद जी उस दहकते हुए खम्बे की ओर श्री हरि विष्णु नारायण का ध्यान करते हुए बढे...


खम्भ फाड़ श्री नरसिंह जी का प्रकट होना...


अपने प्रिय भक्त का अटूट विश्वास और हिरण्यकश्यप के पाप का घड़ा भरा हुआ देख स्वयं भगवान श्री हरि विष्णु नारायण श्री नरसिंह जी के रूप में सिंह की सी गर्जना करते हुए उस खम्बे को फाड़कर प्रकट हुए...


भगवान श्री हरि विष्णु नारायण का वो रौद्र रूप बहुत ही भयंकर था... उनका शीश सिंह का था... उनका शरीर मनुष्य का था... हाथों में सिंह के से बड़े बड़े नाख़ून थे... श्री भगवान का वह रूप देख वहां उपस्थित सभी लोग डरने लगे...यहा तक स्वयं  प्रहलाद  जी भी एक क्षण के लिए डर गए... हिरण्यकश्यप ने श्री भगवान का ये रूप देखा तो वो भी डर से कांपने लगा...

हिरण्यकश्यप द्वारा, श्री नरसिंह जी पर असफल प्रहार का प्रयास करना...


फिर हिरण्यकश्यप कुछ संभलकर भगवान श्री नरसिंह जी पर प्रहार करने लगा... परन्तु श्री भगवान के प्रहार का वेग वो सहन न का सका और कुछ ही समय में थक गया...और श्री हरि  विष्णु नारायण जिन्होंने नरसिंह देव जी के रूप में अवतार लिया था... वे उसी क्रोधित मुद्रा में सिंह की सी गर्जना करते हुए हिरण्यकश्यप के समीप गए... और उसे अपने नाखून वाले हाथो से पकड़ के बीच सभा में घसीटते हुए उस सभा के द्वार की देहली पर ले गए... और हिरण्यकश्यप को अपने गोद में उठा कर लिटा लिया...


श्री भगवान का ये रूप देख हिरण्यकश्यप के मुख से एक भी स्वर नहीं निकला... और फिर भगवान नरसिंह देव यह देख उससे इस प्रकार कहने लगे :
“हे असुरवंशी हिरण्यकश्यप !! तुझे ब्रह्मा जी का वरदान था... की तू किसी ब्रह्मा की सृष्टि से नहीं मरेगा... तो देख मैं स्वयं ब्रह्मा की सृष्टि में नहीं हूँ... न मैं नर हूँ न पशु... न देवता हैं न दैत्य... इस समय न दिन हैं न रात्रि हैं... इस समय सायंकाल हैं... तुझे न अस्त्र से मारा जा रहा है न शस्त्र से... तुझे स्वयं में अपने इन नाखूनों से मारूंगा... तू न धरती में है न आकाश में... देख तू मेरी गोद में हैं... तू उन बारह महीनो में भी नहीं मारा जा रहा... केवल तेरे लिए ही मैंने इस अधिक [पुरषोतम] मास की रचना की हैं... न तू अन्दर हैं न बाहर... तुझे  मैं घर की द्वार की देहली में मार रहा हूँ...”


श्री नरसिंह भगवान के द्वारा, हिरण्यकश्यप का अपने नुकीले नाखुनो से पेट फाड़ कर वध करना...

 

ऐसा कह श्री हरि नरसिंह जी सिंह की सी तेज गर्जना करते हुए... अपने नुकीले लंबे लंबे नाखूनों से हिरण्यकश्यप का पेट फाड़ देते हैं... और हिरण्यकश्यप का वध कर पाप का अंत कर देते हैं.... भगवान नरसिंह जी हिरण्यकश्यप के शव को दूर फेंक खड़े हो... जोर जोर से सिंह के समान गर्जना करने लगते हैं...


हिरण्यकश्यप वध पश्चात, श्री नरसिंह जी द्वारा उसके शव को फेंकना और रौद्र रूप में सिंह के समान गर्जना करना...

यह दृश्य देख प्रहलाद जी के आँखों से अश्रु की धराया बहने लगती हैं और वे अपने हाथो में श्री नरसिंह जी के लिए फूलो की माला लिए श्री हरि विष्णु का ध्यान करने लगते हैं... वहां पर उपस्थित समस्त असुर, दैत्य सैनिक अदि नतमस्तक हो भगवान नरसिंह जी से हाथ जोड़ क्षमा प्रार्थना करने लगते हैं...


तत्पश्चात उस सभा में भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा , इन्द्र आदि देवतागण प्रकट हो, भगवान श्री नरसिंह देव जी की करबद्ध स्तुति करने लगे....


भगवान श्री नरसिंह जी का रौद्र रूप किसी प्रकार से शांत होता न देख... तत्क्षण श्री प्रहलाद जी अपने अश्रु पूर्ण नेत्रो के साथ श्री नरसिंह जी की प्रार्थना करते हैं...


श्री प्रहलाद जी, अपने आराध्य देव श्री नरसिंह जी की स्तुति करते हैं....


नमो नमो नारायणा... नमो नमो नारायणा...
जय नरसिंह नारायणा... अद्भुत छवि नारायणा....
नमो नमो नारायणा... नमो नमो नारायणा...


नरसिंह रूप हरे, प्रभु नरसिंह रूप हरे...
शांत शांत जगदीश्वर, कृपा करो परमेश्वर...
चरण पडू मैं तुम्हरे, ॐ जय नरसिंह हरे...
नरसिंह रूप हरे, प्रभु नरसिंह रूप हरे...


हे शरणागत वत्सल, भक्तन हितकारी...
तुम्हरा यश गावेंगे, युग युग नर नारी...
हे प्रहलाद के रक्षक, हे पालक यह बालक...
चरणन शीश धरे, ॐ जय नरसिंह हरे...


नरसिंह रूप हरे... प्रभु नरसिंह रूप हरे...
शांत शांत जगदीश्वर, कृपा करो परमेश्वर...
चरण पडू मैं तुम्हरे, ॐ जय नरसिंह हरे...
नरसिंह रूप हरे, प्रभु नरसिंह रूप हरे...


नमो नमो नारायणा.... नमो नमो नारायणा...
जय नरसिंह नारायणा... अद्भुत छवि नारायणा...
नमो नमो नारायणा... नमो नमो नारायणा...


इस प्रकार अपने परम भक्त की करुण प्रार्थना सुनकर श्री नरसिंह भगवान का क्रोध शांत हो गया... और उन्होंने श्री प्रहलाद जी को अपनी गोद में बिठा अपने हाथो से उनके बालो को संवारने लगे और अपनी जीभ से उनको चाटने लगे... जैसे कोई सिंहनी अपने शावको को प्रेम से वशिभुत हो चाटती हैं...


तब श्री नरसिंह भगवान श्री प्रहलाद जी से बोले :
“हे वत्स !! मैं तुमसे और तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ...तुम मुझसे कुछ वरदान मांग लो...”


श्री प्रहलाद जी बोले:
“हे नाथ!! मैं जिन भी हजारों योनियों में विराजूं, उन उन सभी जन्मों में मैं सदा आप की निरन्तर भक्ति करूं.... हे! अच्युत आप कृपा कर मेरी यह इच्छा पूर्ण करो...”



श्री नरसिंह भगवान बोले:
“हे प्रहलाद!! मुझमें तो तुम्हारी अनन्य भक्ति है ही और आगे भी ऐसे ही रहेगी... तुम्हें और जो भी वर की इच्छा हो मुझ से ले लो...”






श्री प्रहलाद जी बोले:
“हे श्री हरि नारायण!! आपकी स्तुति करने के कारण, मुझ से जो पिताश्री ने द्वेष किया था, उससे उन्हें जो पाप लगा था, उनका वह नष्ट हो जाये.... मुझे पर्वत के ऊपर से गिराया... अग्नि में जलाया... मुझे नागो के भरे हुए कुण्ड में डाला... और हाथी के नीचे दबवाने की कोशिश की... तेल की गरम गरम कढ़ाई में मुझे बिठाया गया तथा और जो भी असाधु कार्य मेरे पिता श्री ने मेरे विरुद्ध किये, आप में भक्तिमान मनुष्य से द्वेष करने के कारण जो उनहें पाप प्राप्त हुआ है... हे! प्रभु!! आप की कृपा से जल्द ही मेरे पिता उस से मुक्त हो जायें... और मेरे पिता श्री को मोक्ष प्रदान करे प्रभु...”


श्री नरसिंह भगवान बोले:
“हे भक्त प्रहलाद, मैं तुम्हारी पितृभक्ति से भी बहुत प्रसन्न हुआ.... मेरी कृपा से तुम्हारे पिता हिरण्यकश्यप मोक्ष को प्राप्त करेंगे...  मैं तुम्हें और वर देना चाहता हूं, वर माँगो..."




श्री प्रहलाद जी बोले :
”हे भगवान, आप ने जो मुझे वर दिया की मैं आप की कृपा से भविष्य में भी आप की अव्यभिचारिणी भक्ति करूँगा... मैं तो उस से ही कृत कृत हो गया हूँ... धर्म, अर्थ, काम उसके लिये क्या हैं, वह तो मुक्ति को अपने हथेली पर स्थित किये हुये है, जो इस सारे संसार की मूल आप की भक्ति में स्थित है..."


श्री नरसिंह भगवान बोले:
"जैसी तुम्हारा चित्त निश्चल मेरी भक्ति में स्थित है, वैसे ही मेरी कृपा से तुम परम निर्वाण पद प्राप्त करोगे..."






तत्पश्चात श्री प्रहलाद जी ने पुनः श्री हरि नरसिंह जी की स्तुति हरि अष्टकम नामक स्त्रोत से की जो इस प्रकार करते हैं...

श्री प्रहलाद जी द्वारा श्री नरसिंह भगवान का श्री हरि अष्टकम स्तोत्र से स्तुति करना...
       

                          !! श्री हरि अष्टकम !!


हरिर्हरति पापानि दुष्टचितैरपि स्मृतः ।
अनिच्छयाऽपि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥

भगवान श्री हरि समस्त पापों को हर लेते हैं चाहे दुष्ट चित् ने ही उन्हें क्यों न याद किया हो, या न चाहते हुये भी उन्हें किसी ने याद किया हो... बिलकुल वैसे ही जैसे अग्नि का स्पर्श करने से वह हर वस्तु को जला कर भस्म कर देती हैं.... वह, यह नहीं देखती कौन सी वस्तु पवित्र है और कौन से अपवित्र...


स गँगा स गया सेतुः स काशी स च पुष्करम् ।
जिह्वाग्रे वर्तते यस्या हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥

उस प्राणी ने श्री गंगा, सेतु, काशी और पुष्कर के दर्शन कर लिये जिसके मुँह मे भगवान श्री हरि का नाम के ये दो अक्षर निरंतर रहते हैं...

वाराणस्यां कुरुक्षेत्रे नैमिशारण्य एव च ।
यत्कृतं तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥

उस प्राणी ने वाराणसी, कुरुक्षेत्र, नैमिशारण में जो भी पुण्य कार्य हुये हैं वो सब कर लिये जो हरि नाम के ये दो अक्षरों का उच्चारण करता हैं....


पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुन्यान्यायतनानि च ।
तानि सर्वाण्यशेषाणि हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥

पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं और अन्य भी जितने पुण्य और पवित्र स्थान हैं वो सब हरि, ये दो अक्षरों में हैं...


गवां कोटिसहस्राणि हेमकन्यासहस्रकम् ।
दत्तं स्यात्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥

एक करोड़ गाऐं उसने दान कर दीं और एक हजार सोने की मूर्तीयाँ भी, जो हरि, ये दो अक्षरों का उच्चारण करता हैं...


ॠग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदोऽप्यथर्वणः ।
अधीतस्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥

ॠग, साम, यजुर और अथर्व, ये चारों वेद उस ने पढ़ लिये हैं जो हरि, इन दो अक्षरों का ऊच्चारण करता है...


अश्वमेधैर्महायज्ञैः नरमेधैस्तथैव च ।
इष्टं स्यात्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥

अश्वमेध नाम के महायज्ञ से और नरमेध यज्ञ से जो पुण्य फल प्राप्त होते हैं वो सब भगवान हरि का नाम लेने वाले को प्राप्त होते हैं....


प्राण प्रयाण पाथेयं संसार व्याधिनाशनम् ।
दुःखात्यन्त परित्राणं हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥

हरि नाम के ये दो अक्षर कानों द्वारा प्राणों के रस्ते जाकर संसार रूपी बीमारी का नाश कर देते हैं और अत्यन्त दुख का अन्त करते हैं...


बद्ध परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ।
सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षर द्वयम् ॥

जो हरि का नाम लेते हैं वे पुण्यशील लोग हाथ जोड़े मोक्ष कि तरफ बढते हैं....


                         !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाये !!


श्री प्रहलाद जी के मुख से श्री हरि अष्टकम के यह स्त्रोत्र सुन भगवान नरसिंह देव बहुत ही प्रसन्न होते हैं और भक्त प्रहलाद को अपना स्नेह आशीष देकर वे वहां से अन्तर्ध्यान हो जाते हैं...


श्री प्रहलाद जी का राज्याभिषेक स्वयं ब्रह्मा जी द्वारा करना...

पिता के भगवान विष्णु के नरसिंह रूप द्वारा मृत्यु पश्चात, श्री प्रह्लाद जी को राजा बनाया जाता हैं... और तब श्री प्रहलाद जी राजपद प्राप्त कर, कर्मों द्वारा शुद्धि करते हुये, बहुत से पुत्र पौत्रों को प्राप्त कर वे बलशाली और ऐश्वर्य युक्त राज्य का उपभोग करते हुए और भगवान श्री हरि का ही ध्यान करते हुये, पाप और पुण्य से मुक्त हुये और उन्हों ने अन्त में निर्वाण प्राप्त किया...



श्री प्रहलाद जी का श्री हरि विष्णु के वैकुण्ठ धाम गमन...


जो कोई भी प्राणी सच्चे हृदय से श्री नरसिंह जी और श्री प्रहलाद जी के इस चरित्र को सुनता अथवा कहता हैं.... उसके पापों का जल्दी ही क्षय हो जाता है... दिन और रात मे किये पाप से, श्री नरसिंह जी और प्रहलाद जी का चरित्र सुनने या पढने से, मनुष्य मुक्त हो जाता है, इस में कोई शक नहीं है...

बंगलुरु स्थित इस्कोन मंदिर में विराजित श्री नरसिंह जी और श्री प्रहलाद जी का श्री विग्रह...


जैसे भगवान हरि जी ने प्रहलाद जी की सभी संकटों से रक्षा की थी, उसी प्रकार वे उसकी भी रक्षा करते हैं जो उनके श्री चरित्र को सदा सुनता है...


यह भगवान श्री हरि नरसिंह जी और उनके परम भक्त श्री प्रहलाद जी का पवित्र चरित्र वर्णन था....इस कलियुग में यह परम सुख दायी है...


!! श्री नरसिंह मंत्र !!


ऊँ उग्राम, विक्रम, महाविष्णु,

ज्वलंतम, सर्वतो मुखम,

नरसिंहम, भीषणम, भद्रम,

मृत्योर-मृत्युः नाम यहम.

 
"हे! क्रुद्ध एवं शूरवीर महाविष्णु, तुम्हारी ज्वाला एवं ताप चतुर्दिक फैली हुई है.... हे! नरसिंह देव, तुम्हारा चेहरा सर्वव्यापी है... तुम मृत्यु के भी यम हो और मैं तुम्हारे समक्षा आत्मसमर्पण करता हूँ..."


हे! भगवान श्री हरि विष्णु नारायण, आपके इस स्वरूप को मेरा बारम्बार नमस्कार है। !!


!! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
!! जय जय श्री नरसिंह देव जी !!
!! जय जय श्री भक्त शिरोमणि प्रहलाद जी !!


छवियाँ : "गूगल से साभार"

8 comments:

  1. आह ..ह्रदय विदारक रचना..
    बहुत सुन्दर और संवेदनशील रचना!

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  2. ओम नमो भगवते वासुदेवाय....!!!

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  3. ओम नमो भगवते वासुदेवाय

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  4. ओम नमो भगवते वासुदेवाय

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  5. ओम नमो भगवते वासुदेवाय

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