!! ॐ !!


Sunday, December 26, 2010

!! ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भर छाछ पे नाच नचावेँ... !!








आज हमारे प्यारे छोटे से श्यामसुन्दर बाल ग्वालो की टोलियो के संग माखन चुराने चल पड़े है... सभी ग्वाल बाल जब एक गोपी के घर में माखन चुराने पहुंचे, तब सहसा उनकी नजर ऊपर लटकी हुई माखन की मटकी के छींको पर पड़ी... उन माखन की मटकी के छींको तक पहुचने के लिये सभी ग्वाल बाल ने मिल कर छोटे से कन्हैया को अपने कंधो पर उठा लिया.. और ...कन्हैया अपने छोटे छोटे हाथो से माखन निकालते हुए अपनी छोटी छोटी बैया से सभी ग्वाल बालो को खिलाने लगे... माखन की इस लुट को देख वहाँ कुछ बन्दर और बंदरिया भी माखन के स्वाद का आनद लेने पहुँच गए... और जब इस लुट की आवाजों से नींद में सोयी हुई गोपी सहसा जाग पड़ी तो, वे इस प्रकार चिल्लाती हुई दौड पड़ी कन्हैया और सभी ग्वालो की टोली को पकड़ने के लिये...




फोड़ दियो मटकी रे, चुराने म माखन कन्हाई रे...
जागो रे जागो, जागो रे जागो....
आयो रे माखन चोर, जागो रे जागो, जागो रे जागो...]



मटकी पर मटकी, छींका पर लटकी, छोटो कन्हाई रे...
चुराने म माखन कन्हाई रे, जागो रे जागो, जागो रे जागो..



निकल्यो कन्हाई, सब ने सताने...
वाला क संग मैं माखन चुराने, आफत है आई रे...
चुराने म माखन कन्हाई रे, जागो रे जागो, जागो रे जागो...



ग्वाला प ग्वाला, ऊपर कन्हाई...
लिपटायो मुख म माखन मलाई, छोटी कलाई रे...
चुराने म माखन कन्हाई रे, जागो रे जागो, जागो रे जागो...



जागी गुजरिया, देखी मटकिया...
ग्वाल-बाल संग बन्दर-बंदरिया, दौड़ लगाई रे...
चुराने म माखन कन्हाई रे, जागो रे जागो, जागो रे जागो...



पकड़ो रे पकड़ो, मच गयो शोर...
आयो ह आज कोइ माखन चोर, रात जगाई रे...
चुराने म माखन कन्हाई रे, जागो रे जागो, जागो रे जागो...



आयो पकड़ म, छोटो सो बालो...
देखी तो बोली नन्द को लालो, यशुमती जाई रे...
चुराने म माखन कन्हाई रे, जागो रे जागो, जागो रे जागो...



बांधी कलैया, मिलकर गुजरिया...
ल्याई पकड़ तेरो लालो म्हें मैया, कठे कन्हाई रे...
चुराने म माखन कन्हाई रे, जागो रे जागो, जागो रे जागो...



तेरो ह ढोलो, नहीं मेरो लालो...
प्रभु स पड़ गयो 'टीकम' जी पालो, लीला दिखाई रे...
चुराने म माखन कन्हाई रे, जागो रे जागो, जागो रे जागो...
 



प्रिय प्रभु प्रेमियों... इनकी लीलाये तो अपरम्पार है... माखन की चोरी में जब कभी ये छोटे से श्यामसुन्दर गोपियों द्वारा पकड़ लिये जाते तो वे गोपियाँ छोटे से कन्हैया से यूँ कहती-





एक गोपी सुशीला ने कहा :  "क्यों रे कनुआ... आज आये हो पकड़ में...... तेरी मैया तो हमारी बात का विश्वास नहीं करती... आज तुम्हे रंगे हाथो पकड़ा हैं... चल अब तुम्हे तुम्हारी मैया के पास ले चलती है... वो कहती है, मेरे लल्ला के घर में क्या माखन की कमी हैं, जो वो तेरे घर में माखन चोरी करने जायेगा...."



यह सुन नटखट श्यामसुंदर को एकाएक कुछ उत्तर न सुझा और कहने लेगे : " वो मैं....वो मैं...."



दूसरी गोपी सकुन्तला ने उनकी बात को बीच में ही काटते हुए कहा : "अच्छा मेरी कुशलक्षेम पूछने आये थे... मैं तो ठीक हूँ... अच्छा यह बताओ माखन खाओगे...."



नटखट श्यामसुंदर ने कहा : "हाँ काकी, दो न माखन... और ठंडी ठंडी छाछ भी देना... बहुत प्यास लग रही हैं..."




सुशीला ने कहा : "हमारी एक शर्त हैं....तुम हम सभी को चुम्बन दोगे और हमारे साथ नृत्य करोगे तभी माखन देंगी..."



नटखट श्यामसुंदर ने जब सुशीला के इन वचनों को सुना तो लज्जा से आँखों को नीचे झुका इस प्रकार कहने लगे : "काकी, मुझे लाज आती है..."



एक गोपी संगीता ने कहा : "ओ ओह... लाज आती है... माखन चोरी करते हुए लाज नहीं आती तुम्हे..."



नटखट श्यामसुंदर ने सोचा, अब इनके चुंगल में फंस गया हूँ, अब कोई चारा नहीं, ये जैसे बोलेंगी., मुझे वैसे ही करना पड़ेगा...



ऐसा सोच उन्होंने इसप्रकार कहा : "ठीक है !! होले होले लेना.....और एक एक करके लेना... मेरे गाल बहुत ही कोमल हैं, छिल न जाये... "



तत्पश्चात समस्त ग्वालिनो ने उनका एक एक करके वास्तल्य भाव के साथ उनका चुम्बन लिया.....वास्तव में वे गोपियाँ तो श्री श्यामसुंदर की इन लीलाओ का आनंद उठाना चाहती थी... मैया यशोदा के पास उनकी शिकायत करना तो बस एक बहाना मात्र था...



जब सभी ने एक एक कर चुम्बन ले लिया अब नटखट श्यामसुंदर इस प्रकार कहने लगे : " अच्छा अब मुझे छाछ पिलाओ और माखन खिलाओ..."



इसपर गोपी सुशीला ने उनको छाछ पिलाई और माखन भी खिलाया...



तत्पश्चात एक गोपी सुमित्रा ने कहा : "अरे ओ कान्हा... मैने सुना है कि, तुझे बहुत ही सुन्दर नृत्य करने आता है.....आज हमे भी अपना नृत्य दिखाओ न... फिर हम तुम्हे और भी छाछ देंगी और ढ़ेर सारा माखन भी देंगी.... "



बिचारे छोटे से नटखट श्यामसुंदर उन ग्वालिनो के चुंगल में अच्छे से फंस चुके थे...



ऐसा सुन नटखट श्यामसुंदर ने मन ही मन कुछ सोच कर कहा : "हाँ आता तो है....परन्तु नृत्य करने के बाद मेरी कमर लचक जाती हैं... ठीक है, अगर तुम लोग इतनी प्रार्थना कर रही हो तो थोड़ी देर नृत्य कर लूँगा....परन्तु तुम लोग भी मेरे साथ नृत्य करना..."



ऐसा कह सभी ग्वालिने नटखट श्यामसुंदर के साथ नृत्य करने लगी.... श्यामसुंदर उनके बीच में थे और वे सभी उनके चारो और गोलाकार चकरी बनाकर नृत्य करें लगी...



नृत्य के बीच में ही नटखट श्यामसुंदर ने कहा : " मैं थक गया हूँ , थोरी सी छाछ पिला दो "



यह सुन सुशीला ने उनको छाछ पिलाया और वे सभी फिर से नृत्य करने में मग्न हो गए.....


 
ब्रज के रसिक कवि श्री रसखान जी ने प्रभु की इस अनुपम लीला पर बहुत ही सुन्दर पद लिखा है...



सेस, गनेस, दिनेस, महेस, सुरेसहु जाके निरंतर ध्यावेँ...
आदि अनादि अनंत अखंड, अभेद अछेद सुवेद बतावेँ...
नारद से सुनि व्यास थके, पचि हारि गए तहोँ भेद न पावेँ...
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भर छाछ पे नाच नचावेँ...



लाय समाधि रहे ब्रम्हादिक, जोगी भये पर अंत न पावेँ...
साँझ ते भोरहिँ भोर ते सांझहि, सेस सदा नित नाम जपावैँ...
ढूँढे फिरै तिरलोक में साख ,सुनारद ले कर बिन बजावैँ...
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भर छाछ पे नाच नचावेँ...



गूँज गरे सिर मोरपखा अरु, चाल गयंद की मो मन भावै...
साँवरो नंदकुमार सबै, ब्रज मंडली में ब्रजराज कहावै...
साज़ समाज सबै सिरताज, ओ लाज की बात नहीं कही आवै...
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भर छाछ पे नाच नचावेँ...



!! जय जय कृष्ण कन्हैया लाल की !!

1 comment:

  1. आनन्द आ गया।

    दही खाय खाय बिगड गयो
    यशोदा तेरो संवरिया
    मैने टोका तो अटक गयो
    यशोदा तेरो संवरिया

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