!! ॐ !!


Wednesday, November 24, 2010

!! यादों में तेरे श्याम, हम नीर बहाते हैं... !!




 अक्सर ऐसा कहा जाता है, प्रेम आत्मा का दर्पण होता है... प्रेम की ताकत के आगे परम पिता परमेश्वर भी बेबस हो जाते है अर्थात प्रेम में वह शक्ति है, जिससे जीव भगवद स्वरुप का साक्षात्कार कर सकता है... प्रभु से प्रेम करने वाला भक्त संसार के किसी भी चीज़ से भयभीत नहीं होता... क्योंकि वह अपना तन-मन प्रभु को समर्पित कर चुका होता है...


मेरा तो ऐसा भी मानना है कि, प्रेम का भाव छिपाने से कतई छिपता नहीं है... प्रेम जिस हृदय में प्रकट होकर उमड़ता है उस को छिपाना उस हृदय के वश में भी नहीं होता है... और वह इसे छिपा भी नहीं पाता है... यदि वह मुख से प्रेम-प्रीत की कोई बात न बोल पाए तो उसके नेत्रों से प्रेम के पवित्र अश्रुओं की धारा निकल पड़ती है अर्थात् हृदय के प्रेम की बात नेत्रों से स्वत: ही प्रकट हो जाती है... और प्रभु मिलन को तरसता वो हृदय प्रेमाश्रुओं के साथ इस प्रकार अपने ईष्टदेव से अनुनय विनय करने लगता है...




इस मधुर भाव का रसास्वादन यहाँ करे...


  
यादों में तेरे श्याम, हम नीर बहाते हैं...
आते नहीं क्यों घनश्याम, क्यों आप सताते हैं...
यादों में तेरे श्याम, हम नीर बहाते हैं...
आते नहीं क्यों घनश्याम, क्यों आप सताते हैं...



बैठे हैं राहों में, पलकों को बिछाये हम...
कब होगी महर तेरी, पलकों पे तेरी रहम...
अब और न देर करो, हम तुमको बुलाते हैं...
यादों में तेरे श्याम, हम नीर बहाते हैं...


प्यासा है दिल मेरा, प्यासे हैं नयन मेरे...
तूं प्यास बुझादे श्याम, दे कर दर्शन तेरे...
दर्शन को हम तरसे, हमें क्यों तरसाते हैं...
यादों में तेरे श्याम, हम नीर बहाते हैं...



शीशा सा दिल है मेरा, पत्थर ना समझ लेना...
'टीकम' गर टूट गया, चरणों में तूं लेना...
कण- कण में तूं है श्याम, ये तो दर्शाते है...
यादों में तेरे श्याम, हम नीर बहाते हैं...


यादों में तेरे श्याम, हम नीर बहाते हैं...
आते नहीं क्यों घनश्याम, क्यों आप सताते हैं...
यादों में तेरे श्याम, हम नीर बहाते हैं...
आते नहीं क्यों घनश्याम, क्यों आप सताते है...



!! जय जय हो श्री यशोदानंदन घनश्याम जी !!
!! जय जय हो श्री मोरवीनंदन श्याम जी !!
!! जय हो समस्त भक्तवृंद के प्रेमाश्रुओं की !!
!! जय हो समस्त भक्तवृंद के श्रीहृदय में विराजित श्री श्यामसुन्दर की !!



 भाव : "श्री महाबीर सराफ जी"

Monday, November 22, 2010

!! बीच लाल ब्रजचंद सुहाये, चुन ओर ब्रज गोप...!!



ब्रजवासी तें हरि की शोभा... !
बैन अधर छवि भये त्रिभंगी, सो वा ब्रजकी गोभा... !!


ब्रज बन धातु विचित्र मनोहर, गुंज पुंज अति सोहें...!
ब्रजमोरिन को पंख शीश पर ब्रज जुवती मन मोहें...!!


ब्रज-रजनी की लगति अल्कलपे, ब्रजद्रुम फल अरु माल... !
ब्रज गऊवन के पीछे आछे, आवत मद गज चाल...!!


बीच लाल ब्रजचंद सुहाये, चुन ओर ब्रज गोप...!
नगरिया परमेसुरहु की ब्रज तें बाढ़ी ओप...!!




!! जय जय श्री श्यामसुन्दर जी !!

भाव : "श्री सुरदास जी"

Tuesday, November 9, 2010

!! माँ की ममता बड़ी निराली, समझ नहीं कोई पाया...!!



मातृशक्ति, सृष्टि की रचना के साथ ही पूजनीय है... देवियों की पूजा, माँ की महिमा व महत्व को ही रेखांकित करती हैं...विश्व भर में मातृशक्ति की पूजा की जाती है...सच कहू तो, "माँ" इस एक शब्द में इतनी ममता घुली है, जितना सागर में पानी...


आइये सभी मिल उस मातृशक्ति का आवाहन कर करवद्ध इन भावो के साथ उनकी वंदना करे...



जब जब तेरी याद सताये, दर तेरे हम आये...
दे दे दर्शन मुझको मैया, क्यूँ तू यूँ तरसाये...
जब जब तेरी याद सताए, दर तेरे हम आये...
दे दे दर्शन मुझको मैया, क्यूँ तू यूँ तरसाये...


माँ बेटे का रिश्ता मैया, होता बड़ा ही पावन...
बेटा जो रूठे तो मैया, देती लोभ लुभावन...
मात यशोदा और कोशल्या, बड़े ही लाड लड़ाये...
दे दे दर्शन मुझको मैया, क्यूँ तू यूँ तरसाये...


माँ की ममता बड़ी निराली, समझ नहीं कोई पाया...
देवों का मन माँ की ममता, पाने को ललचाया...
ले गोद में अनसुया, देवों को दुध पिलाये...
दे दे दर्शन मुझको मैया, क्यूँ तू यूँ तरसाये...


हो बेटा मानव या दानव, सब पर करती समता...
फैला कर आंचल माँ अपना, देती छाया ममता...
महिषासुर जैसे को मैया, भव से पार लगाये...
दे दे दर्शन मुझको मैया, क्यूँ तू यूँ तरसाये...


साकार करो मेरा यह जीवन, दे कर मैया दर्शन...
'टीकम' तो बालक है तेरा, भोला है इसका मन...
करेगा सेवा तेरी मैया, तू जो भी फरमाये...
दे दे दर्शन मुझको मैया, क्यूँ तू यूँ तरसाये...


जब जब तेरी याद सताये, दर तेरे हम आये...
दे दे दर्शन मुझको मैया, क्यूँ तू यूँ तरसाये...


                             !! जय माता दी !!
                             !! जय दादी की !!
                             !! जय मैया की !!


           भाव के रचियता : "श्री महाबीर सराफ जी"

Saturday, November 6, 2010

!! श्री गोवर्धन महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रहयो... !!







आज श्री गिरिराज गोवर्धन जी का पूजनोत्सव हैं, जैसा की सभी जानते हैं कि, हमारे प्रिय श्री गिरिराज गोवर्धन जी, सम्पूर्ण ब्रजमंडल के अधिष्ठात्र देव भगवान श्री कृष्ण से कतई भिन्न नहीं है... भगवान श्री श्यामसुन्दर ने स्वयं श्री गिरिराज जी के रूप में प्रकट होकर सभी ब्रजवासियो के द्वारा की गयी पूजा और छप्पन भोग को स्वीकार किया था... और उन्ही ब्रजवासियों की रक्षा हेतु इन्ही गिरिराज गोवर्धन जी को अपनी उंगली में सात दिन और सात रात तक धारण कर गिरिराज धरण कहलाये...


ऐसे पवित्र गिरिराज गोवर्धन जी की स्तुति कौन नहीं करना चाहेगा...श्री गिरिराज गोवर्धन महाराज की यह स्तुति जब भी मैं सुनता हूँ, तो मेरा ह्रदय श्रद्धा से विभोर हो जाता है...और अनायास ही मेरे पाँव उनके प्रति प्रेम भावना से वशीभूत हो स्वयं थिरकने लग जाते है...



श्री गोवर्धन महाराज... ओ महाराज... तेरे माथे मुकुट विराज रहयो...
श्री गोवर्धन महाराज... ओ महाराज... तेरे माथे मुकुट विराज रहयो...


तो पे पान चढ़े, तो पे फुल चढ़े... ओ, तो पे पान चढ़े, तो पे फुल चढ़े...
तो पे चढ़े दूध की धार... हाँ धार... तेरे माथे मुकुट विराज रहयो...


तेरे गले में कंठा सोह रहयो... ओ तेरे गले में कंठा सोह रहयो...
तेरी ठोडी पे हीरा लाल... हाँ लाल... तेरे माथे मुकुट विराज रहयो...


तेरे कानन कुण्डल चमक रहयो... ओ तेरे कानन कुण्डल चमक रहयो...
तेरे गल वैजयन्ती माल... हाँ माल... तेरे माथे मुकुल विराज रहयो...


तेरी झांकी जग से न्यारी हैं... ओ तेरी शोभा सबसे प्यारी हैं....
तेरी झांकी बनी विशाल... हाँ विशाल... तेरे माथे मुकुट विराज रहयो...


तेरे मानसी गंगा बहे सदा... ओ तेरे मानसी गंगा बहे सदा....
तेरी माया अपरम्पार... हाँ पार... तेरे माथे मुकुट विराज रहयो...


तेरी सात कोस की परिकरमा... ओ तेरी सात कोस की परिकरमा...
चकलेश्वर है विश्राम... हाँ विश्राम... तेरे माथे मुकुल विराज रहयो...



ब्रज मंडल जब डूबत देखा... ओ जब ग्वाल बाल व्याकुल देखा...
लिया नख पर गिरिवर धार... हाँ धार... तेरे माथे मुकुट विराज रहयो...


गोवर्धन जी अति पावन हैं... ओ वृन्दावन जी मनभावन हैं...
और पावन ब्रज की माट... हाँ माट... तेरे माथे मुकुट विराज रहयो...


श्री गोवर्धन महाराज... ओ महाराज... तेरे माथे मुकुट विराज रहयो...
श्री गोवर्धन महाराज... ओ महाराज... तेरे माथे मुकुट विराज रहयो...


आप सभी भक्तवृंद इस अनुपम स्तुति को नीचे दिए गए youtube  की लिंक पर क्लिक करके सुन भी सकते है...




!! जय जय श्री श्री गिरिराज गोवर्धन जी !!
!! जय जय श्री गिरिराज धरण श्री श्यामसुन्दर जी !!

Wednesday, November 3, 2010

!! मन को मनमोहन, का साथ चाहिए... !!



ओ मनमोहन, ओ सुन्दर चितवन वाले मेरे प्रिय श्यामसुन्दर आपके श्री चरणों में हर क्षण यही एक मेरी प्रार्थना है, कि...



हर घड़ी हर पल, तेरा साथ चाहिए...
दिन हो या रात, मुलाक़ात चाहिए...
हर घड़ी हर पल, तेरा साथ चाहिए...


तुमसा गर हो साथी, तो फिर क्या बात है...
हो जाती पूरी मन की, सारी मुराद है...
मन को मनमोहन, का साथ चाहिए...
हर घड़ी हर पल, तेरा साथ चाहिए...


मनमोहन हो साथ, खुशियाँ सौगात है...
दुल्हे के पीछे ही, सारी बारात है...
बाराती को दुल्हे का, साथ चाहिए...
हर घड़ी हर पल, तेरा साथ चाहिए...


मिला जो तेरा साथ, हाथों को हाथ है...
आज मेरी ख़ुशी का, यही तो राज है...
'टीकम' को तुमसा, हमराज चाहिए...
हर घड़ी हर पल, तेरा साथ चाहिए...


हर घड़ी हर पल, तेरा साथ चाहिए...
दिन हो या रात, मुलाक़ात चाहिए...
हर घड़ी हर पल, तेरा साथ चाहिए...



!! जय जय श्री यशोदानंदन मनमोहन नन्दलाल की !!
    !! जय जय श्री मोरवीनंदन खाटू श्याम जी की !!






            भाव के रचियता : "श्री महाबीर सराफ जी"


Monday, November 1, 2010

!! कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे... !!






































मनुष्य जीवन सब प्रकार के जीवन से श्रेष्ठ जीवन माना जाता है, क्योकि केवल मनुष्य जीवन में ही जीव को सोचने और समझने की शक्ति जिसे की "बुद्धि" कहते है, मिलती है... इसी जीवन में जीव को किये गए कर्मों के अनुसार फल मिलते है... श्रीमद भागवत महापुराण के अनुसार, जब जीव अपनी माता के गर्भ में आता है, तो वो अपनी आंतरिक चेतन शक्ति... से करवद्ध हो श्री भगवान् से यही प्रार्थना किया करता है, कि... हे! भगवान, मुझे इस विष्टा, थूक, मल-मूत्र के दल-दल से बाहर निकालो... मेरा ये जीवन आपका ही दिया हुआ है, एवं मेरे अंतर्मन में आत्मरूप में आपका ही प्रतिबिम्ब स्वरुप व्याप्त है, इसलिए मैं जैसे ही इस दल दल से बाहर निकलूंगा, अपने इस जीवन को पुण्य कर्म का हेतु बनाकर आपकी भक्ति के द्वारा सैदव आपके शरणागत रहूँगा... इसप्रकार नित निरंतर वो जीव अपनी माता कि गर्भ में श्री भगवान् का चिंतन किया करता है...


परन्तु जब वह जीव अपनी माता के गर्भनाल से अलग होकर जैसे ही इस संसार में जन्म लेता है... वैसे ही उसी श्री भगवान् की ही माया से ग्रसित हो वो गर्भकाल में किये गए अपने प्रभु से किये गए उस वायदे की भान नहीं रख पाता... और इस जीवन की आपाधापी में वो सब कुछ भूलकर अपने इष्ट मित्रो और सगे संबंधियों के साथ तन्मयता से अपना जीवन यापान व्यतीत करने लगता है... और उसी श्री भगवान् की प्रेरणा और अपने कर्म फल के वशीभूत हो उस जीव को जीवन के इस सफ़र में बहुत से उतार चढ़ाव भी देखने पड़ते है... एवं अपने सगे संबंधीजन और इस संसार की मोह माया से दुखित एवं त्रसित हो, उस जीव को सौभाग्यवश जब अपने गुरुजनों और सत्संगीयों के माध्यम से श्री भगवान की परम सत्ता का पुनः भान हो जाता है..., तब फिर वह जीव अपने ह्रदय को निर्मल एवं शुद्धचित करके इसप्रकार श्री भगवान् से स्वयं को अपने शरण में लेने लिए करुण प्रार्थना करने लगता है...



कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...
तु करदे नजर, तु करदे महर...
चरणों में जगह दे मुझे...
कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...


छोड़ दर मैं तेरा, अब जाऊं कहाँ, नहीं अपना कोई हैं मेरा यहाँ...
ठुकराया गया, मैं लुटाया गया, अपनों से ही मैं सताया गया...
आंसू गम के पिये, उफ़ कर न सके, बचाले तू इनसे मुझे...


कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...
कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...


मैं देंखू जिधर, दिखतें है उधर, फैलाये है फन खड़े अजगर...
लगते हैं सभी, मुझको विषधर, अमृत भी यहाँ लगता है जहर...
वो हँसते रहे, हम रोते रहे, वर शक्ति का दे दे मुझे...


कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...
कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...


है टूटा भ्रम, टूटा है अहम, झुठा था मेरा वो सारा वहम...
भुलाये हैं मैंने, सारे वो गम, आया है शरण तेरे 'टीकम'...
हाथ थामों मेरे, खड़ा दर पे तेरे, वर शक्ति का दे दे मुझे...


कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...
कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...


कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...
तु करदे नजर, तु करदे महर...
चरणों में जगह दे मुझे...
कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...



इसप्रकार जिनकी श्री भगवान् की तरफ रूचि हो गयी, वे ही भाग्यशाली है, श्रेष्ठ है, और वे ही वास्तव में मनुष्य कहलाने योग्य है... अपने इस मनुष्य शरीर का सदुपयोग केवल परोपकार में करना चाहिए एवं अपने आत्मस्वरुप का सदुपयोग सैदव श्री भगवान् के चिंतन में करना चाहिए...


आप सभी भक्तवृंद इस अनुपम भाव को नीचे दी गयी youtube की लिंक पर क्लिक कर सुन भी सकते है...





!! जय जय श्री श्यामसुन्दर जी !!


भाव के रचियता : "श्री महाबीर सराफ जी"
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