!! ॐ !!


Monday, November 1, 2010

!! कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे... !!






































मनुष्य जीवन सब प्रकार के जीवन से श्रेष्ठ जीवन माना जाता है, क्योकि केवल मनुष्य जीवन में ही जीव को सोचने और समझने की शक्ति जिसे की "बुद्धि" कहते है, मिलती है... इसी जीवन में जीव को किये गए कर्मों के अनुसार फल मिलते है... श्रीमद भागवत महापुराण के अनुसार, जब जीव अपनी माता के गर्भ में आता है, तो वो अपनी आंतरिक चेतन शक्ति... से करवद्ध हो श्री भगवान् से यही प्रार्थना किया करता है, कि... हे! भगवान, मुझे इस विष्टा, थूक, मल-मूत्र के दल-दल से बाहर निकालो... मेरा ये जीवन आपका ही दिया हुआ है, एवं मेरे अंतर्मन में आत्मरूप में आपका ही प्रतिबिम्ब स्वरुप व्याप्त है, इसलिए मैं जैसे ही इस दल दल से बाहर निकलूंगा, अपने इस जीवन को पुण्य कर्म का हेतु बनाकर आपकी भक्ति के द्वारा सैदव आपके शरणागत रहूँगा... इसप्रकार नित निरंतर वो जीव अपनी माता कि गर्भ में श्री भगवान् का चिंतन किया करता है...


परन्तु जब वह जीव अपनी माता के गर्भनाल से अलग होकर जैसे ही इस संसार में जन्म लेता है... वैसे ही उसी श्री भगवान् की ही माया से ग्रसित हो वो गर्भकाल में किये गए अपने प्रभु से किये गए उस वायदे की भान नहीं रख पाता... और इस जीवन की आपाधापी में वो सब कुछ भूलकर अपने इष्ट मित्रो और सगे संबंधियों के साथ तन्मयता से अपना जीवन यापान व्यतीत करने लगता है... और उसी श्री भगवान् की प्रेरणा और अपने कर्म फल के वशीभूत हो उस जीव को जीवन के इस सफ़र में बहुत से उतार चढ़ाव भी देखने पड़ते है... एवं अपने सगे संबंधीजन और इस संसार की मोह माया से दुखित एवं त्रसित हो, उस जीव को सौभाग्यवश जब अपने गुरुजनों और सत्संगीयों के माध्यम से श्री भगवान की परम सत्ता का पुनः भान हो जाता है..., तब फिर वह जीव अपने ह्रदय को निर्मल एवं शुद्धचित करके इसप्रकार श्री भगवान् से स्वयं को अपने शरण में लेने लिए करुण प्रार्थना करने लगता है...



कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...
तु करदे नजर, तु करदे महर...
चरणों में जगह दे मुझे...
कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...


छोड़ दर मैं तेरा, अब जाऊं कहाँ, नहीं अपना कोई हैं मेरा यहाँ...
ठुकराया गया, मैं लुटाया गया, अपनों से ही मैं सताया गया...
आंसू गम के पिये, उफ़ कर न सके, बचाले तू इनसे मुझे...


कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...
कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...


मैं देंखू जिधर, दिखतें है उधर, फैलाये है फन खड़े अजगर...
लगते हैं सभी, मुझको विषधर, अमृत भी यहाँ लगता है जहर...
वो हँसते रहे, हम रोते रहे, वर शक्ति का दे दे मुझे...


कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...
कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...


है टूटा भ्रम, टूटा है अहम, झुठा था मेरा वो सारा वहम...
भुलाये हैं मैंने, सारे वो गम, आया है शरण तेरे 'टीकम'...
हाथ थामों मेरे, खड़ा दर पे तेरे, वर शक्ति का दे दे मुझे...


कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...
कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...


कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...
तु करदे नजर, तु करदे महर...
चरणों में जगह दे मुझे...
कान्हा ओ कान्हा, चरणों में जगह दे मुझे...



इसप्रकार जिनकी श्री भगवान् की तरफ रूचि हो गयी, वे ही भाग्यशाली है, श्रेष्ठ है, और वे ही वास्तव में मनुष्य कहलाने योग्य है... अपने इस मनुष्य शरीर का सदुपयोग केवल परोपकार में करना चाहिए एवं अपने आत्मस्वरुप का सदुपयोग सैदव श्री भगवान् के चिंतन में करना चाहिए...


आप सभी भक्तवृंद इस अनुपम भाव को नीचे दी गयी youtube की लिंक पर क्लिक कर सुन भी सकते है...





!! जय जय श्री श्यामसुन्दर जी !!


भाव के रचियता : "श्री महाबीर सराफ जी"

2 comments:

  1. श्यामानुरागी के हम अनुरागी
    कृष्ण दरस की अँखियाँ प्यासी


    आपके भाव बहुत सुन्दर हैं…………और जैसे ही कान्हा को समर्पित पोस्ट देखी तो फ़ोलो भी कर लिया……………आभार्।
    मेरे 3 ब्लोग हैं कभी आइयेगा।
    http://vandana-zindagi.blogspot.com
    http://redrose-vandana.blogspot.com

    aur ye teesra hai jisme kanha ko samarpit kuchh rachanaayein hain ummeed hai aapko pasand aayein .......

    http://ekprayas-vandana.blogspot.com

    ReplyDelete
  2. वन्दना दीदी... अपने ह्रदय के भावो की अभिव्यक्ति करके मेरे उत्साह वर्धन करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद... परन्तु, सच कहू तो मेरा यहाँ अपना कुछ भी नहीं है... मैं तो स्वयं इन सभी भाव के रचियताओं का ह्रदय से आभार प्रकट करता हूँ... मैं, जब कभी किसी भाव पूर्ण भजन को सुनता हूँ, तो उन भावो को आप लोगो के सामने इस ब्लॉग के माध्यम से प्रस्तुत करता हूँ...

    दीदी, आपका ब्लॉग मुझे बहुत ही अच्छा लगा... शत शत नमन आपके ह्रदय के उदगार को, शत शत नमन आपकी लेखनी को...

    !! जय जय श्री श्यामसुंदर जी की !!

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