!! ॐ !!


Tuesday, August 9, 2011

!! जब भी बुरा मैं सोंचु, अंजाम से डरु मैं... !!





"अभिमान" चाहे किसी भी तरह का हो, वह सब मिथ्या ही होता है... जब अभिमान टूटता है तब वह धरातल पर आ गिरता है, और उस समय मुनष्य के पास पछताने के सिवा कुछ नहीं रहता... स्वार्थ और अभिमान का त्याग करने से ही साधुता आती है... प्राचीन काल में ही हमारे पूज्य तथा अनुकरणीय मानव, देवताओं यथा देवराज इन्द्र, नारदजी, अर्जुन, भीमसेन, आदि ने भी कभी ना कभी किसी रूप में अभिमान किया था, तथा भगवान श्री हरि, श्री श्यामसुन्दर द्वारा उनके अभिमान का मर्दन किया गया था... प्रभु अपने प्रिय भक्तो में "अभिमान" क्षणमात्र के लिये भी नहीं रहने देते, क्योकि अभिमान परमात्मा को जीव से दूर ले जाता है,  इसलिए...



हे! प्रिय श्यामसुन्दर, हे! मनमोहन...



इतनी कृपा करो कि, अभिमान ना करूँ मैं...
जब भी बुरा मैं सोंचु, अंजाम से डरु मैं...
इतनी कृपा करो कि, अभिमान ना करूँ मैं...
जब भी बुरा मैं सोंचु, अंजाम से डरु मैं...



चलता रहूँ निरंतर, तेरे नाम के सहारे...
जब भी कही मैं भटकू, कर देना तुम इशारे...
राहों में तेरे मोहन, विश्राम ना करूँ मैं...
इतनी कृपा करो कि, अभिमान ना करूँ मैं...



स्वर्ग भी यहीं है, नरक भी यहीं है...
कर्मो का खेल सारा, कोई तर्क भी नहीं है...
बस इतनी देना शक्ति, अच्छे करम करूँ मैं...
इतनी कृपा करो कि, अभिमान ना करूँ मैं...



जब से किया भरोसा, तुझे साथ अपने पाया...
संकट की हर घड़ी में, तेरा हाथ सिर पे पाया...
बस इतनी सी है अरजी, नित ध्यान तेरा धरूं मैं...
इतनी कृपा करो कि, अभिमान ना करूँ मैं...



क्यूँ दर्द की हो चिंता, जब साथ मेरे तु है...
भक्तो के प्यारे कन्हैया, मेरी जिंद जान तु है...
जनमो पे जनम लेके, तेरी शरण पडूँ मैं...
इतनी कृपा करो कि, अभिमान ना करूँ मैं...



इतनी कृपा करो कि, अभिमान ना करूँ मैं...
जब भी बुरा मैं सोंचु, अंजाम से डरु मैं...
इतनी कृपा करो कि, अभिमान ना करूँ मैं...
जब भी बुरा मैं सोंचु, अंजाम से डरु मैं...



!! जय जय प्रिय श्री श्यामसुन्दर जी की !!
!! जय जय प्रिय श्री श्यामसुन्दर जी की !!
!! जय जय प्रिय श्री श्यामसुन्दर जी की !!

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