!! ॐ !!


Wednesday, June 30, 2010

!! मैली चादर ओढ़ के कैसे... !!


जब में छोटी उम्र का था, तब मेरे घर के पास ही एक मंदिर हुआ करता था, और मैं वहां अक्सर जाया करता था.... उस मंदिर में अक्सर एक सज्जन एक भजन गाया करते मिलते थे.... " मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तिहारे आऊं ".....मुझे इस भजन की राग बहुत ही पसंद थी और मैं भी उन सज्जन के पास खड़ा हो इस भजन को पूर्ण तन्मयता से सुनता था... परन्तु उस समय इस भजन के भाव का ज्ञान मुझे ज्यादा न था....

परन्तु, अब जब कभी भी ये भजन सुनता हूँ, जिसमे एक ऐसे जीव की हृदय वेदना छिपी है, जो की अपने प्रभु को अपने मनोभावों से अवगत कराता है, जिसमे वह जीव अपने आप को उस परमात्मा का अंश "आत्मा" के रूप में देखता है... और अपने इस प्रभु प्रदत तन, को एक चादर के स्वरुप, जिसको की वह स्वार्थवश और मोहवश अपने तरह तरह के कृत्य से "मैली" कर चुका हैं... तो सहसा ही मुझे उन सज्जन का चेहरा और वो मंदिर याद आ जाता हैं...और मन प्रभु के प्रति आभार प्रकट करते हुए हिलोरे मारने लग जाता हैं...आप लोगो ने भी यह भजन जरुर सुना होगा....स्वयं ही देखिये कितनी सुन्दर और निर्मल भाव छुपा है इस भजन में...





आप सभी इस भजन को यहाँ पर सुन सकते हैं...  



मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तिहारे आऊं...
मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तिहारे आऊं...
हे! पावन परमेश्वर मेरे, मन ही मन शरमाऊं...
मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तिहारे आऊं...



तुने मुझको जग में भेजा, निर्मल देकर काया...
आकर के संसार में मैंने, इसको दाग लगाया...
जनम जनम की मैली चादर, कैसे दाग छुड़ाऊं...
मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तिहारे आऊं...



निर्मल वाणी पाकर तुझसे, नाम न तेरा गाया...
नयन मूंद कर हे परमेश्वर, कभी न तुझको ध्याया...
मन वीणा की तारे टूटी, अब क्या गीत सुनाऊं....
मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तिहारे आऊं...



नेक कमाई करी न कोई, जग की माया जोड़ी...
जोड़ के नाते इस दुनिया से, तुम संग प्रीति तोड़ी...
करम गठरिया सिर पे राखे, पग भी चल न पाऊं...
मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तिहारे आऊं...



इन पैरों से चल के तेरे , मंदिर कभी न आया...
जहाँ जहां हो पूजा तेरी, कभी न शीश झुकाया...
हे हरिहर मैं हार के आया, अब क्या हार चढ़ाऊं...
मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तिहारे आऊं...



मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तिहारे आऊं...
मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तिहारे आऊं...
हे! पावन परमेश्वर मेरे, मन ही मन शरमाऊं...
मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तिहारे आऊं...

!! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!



1 comment:

  1. यह भजन मुझे भी बहुत प्रिय है.

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